Jan 092010
 

नदिया किनारे

प्रेषिका : अक्षिता शर्मा

प्रस्तुति – नेहा वर्मा

कार में मैं और रोनी अन्जान थे, पर मुन्ना और बबलू अपनी गर्ल-फ़्रेन्ड्स के साथ थे। चूंकि कार रोनी की थी सो उसे तो साथ आना ही था। मुझे तो मंजू ने कहा था। नैना बबलू के साथ थी। कार कच्ची सड़क पर हिचकोले खाती हुई चल रही थी। पीछे बैठे मन्जू और नैना मुन्ना और बबलू के साथ बड़ी ही बेशर्मी से अश्लील हरकतें कर रही थी। उन्हें देख कर मेरे मन में भी गुदगुदी होने लगी थी। पर मन मसोस कर चुपचाप बैक-मिरर से उनकी हरकतें देख रही थी।

तभी एक गार्डन जैसे स्थान पर रोनी ने गाड़ी रोक दी। साथ में लगी हुई नदी बह रही थी। दूर दूर तक कोई नहीं था। हमने कार में से दरियां निकाल कर उस जन्गल जैसी जगह में बिछा ली। सारा सामान निकाल कर एक जगह लगा दिया। थर्मस से चाय निकाल कर पीने लगे। तभी बबलू और मुन्ना ने अपने कपड़े उतार दिये और मात्र एक छोटी सी अन्डरवियर में आ गए। दोनों ने ही नदी में छलांग मार दी…

मंजू और नैना भी पीछे पीछे हो ली। चारों पानी में उतर गये और खेलने लगे। बस मैं और रोनी वहां रह गये थे। मैं तो जैसे उन सभी के बीच साधारण सी लग रही थी। ढीला ढीला कुर्ता पजामा, कहीं से कोई भी अंग बाहर नहीं झांक रहा था। इसके उलट मैना और मंजू तो अपनी छोटी छोटी स्कर्ट में अपना जैसे अंग प्रदर्शन करने ही आई थी। कुछ ही देर में नदी में छपाक छपक की आवाजें बन्द हो गई। दोनों ही जोड़े पानी के अन्दर कमर तक एक दूसरे के साथ अश्लील हरकतें करने लगे थे।

“कोमल उधर मत देखो … वो तो है ही ऐसे ! यही करने तो आए हैं यहाँ ये सब !” रोनी ने मुझसे कहा।

“जी… जी हां… वो …” मेरे विचारों की श्रृंखला टूट गई थी, मेरे मन की गुदगुदी जैसे भंग हो गई।

“आओ , अपन उधर चलते हैं !”

मैं उसके साथ चुपचाप उठ कर चल दी। एक झाड़ी के झुरमुट के पीछे खड़े हुये ही थे कि मुन्ना और नैना नदी में उसी तरफ़ एकांत देख कर छुपे हुये थे। नैना ने मुन्ना का लण्ड पकड़ा हुआ था और उसकी स्कर्ट नैना के चूतड़ से ऊपर थे जिसे मुन्ना बेरहमी से दबा रहा था। उसे देख कर मेरा दिल जोर से धड़क उठा। रोनी भी हतप्रभ सा रह गया। हम दोनों की नजरें जैसे उन पर जम गई। तभी मुझे अहसास हुआ कि रोनी मेरे साथ में है। मैंने घबरा कर रोनी की तरफ़ देखा। रोनी अभी भी ये दृश्य देख कर सम्भला नहीं था। रोनी का लण्ड जैसे अपने आप करवटें लेने लगा। रोनी ने मेरी तरफ़ देखा… मेरी नजरें अपने आप झुक गई। मेरा मन भी डांवाडोल हो उठा। जवानी का तकाजा था… मेरा चेहरा लाल हो उठा। रोनी की नजरों में लालिमा उभर आई। नैना और मुन्ना की अश्लील हरकतों से मेरी जान पर बन आई थी। लाज से मैं मरी जा रही थी।

“कोमल, यह तो साधारण सी बात है, दोनों जवान है, बस मस्ती कर रहे हैं !”

“ज़ी… नहीं वो बात नहीं … ” मैंने झिझकते हुये कहा। मेरे चेहरे पर पसीना उभर आया था। उसने पीछे से आकर मेरी बाह पकड़ ली। मेरा जिस्म पत्ते की तरह कांप गया। मैंने अपनी बांह उससे छुड़ाने की कोशिश की।

मेरा मन एक तरफ़ तो रोनी की हरकतों से प्रफ़ुल्ल हो रहा था… तो दूसरी तरफ़ डर भी रही थी। मैंने सोचा कि अगर मैं रोनी को छूट दे दूं तो वो फिर मुझे चोदने की कोशिश करेगा। बस यह बात दिल आते ही मेरा दिल धाड़ धाड़ करने लगा। उसी समय मुझे लगा कि रोनी का हाथ मेरे कमर के इर्द गिर्द लिपट गया। मेरा अनछुआ शरीर पहली बार कोई अपनी बाहों में भर रहा था।

“ऐसे मत करिये जी… मैं मर जाऊंगी !”

“कोमल, यहां हमें कोई नहीं देख रहा है, बस एक बार मुझे किस कर लेने दो !”

“क्…क्…क्या कह रहे हो रोनी… मेरी जान निकल जायेगी… हाय राम !”

मेरे ढीले ढाले कुर्ते पर उसके हाथ फ़िसलने लगे। उसका एक हाथ मेरे बालों को सहला रहा था। मुझे जैसे नींद सी आने लगी थी।

“मेरी मां… हटो जी… मुझे मत छुओ … ” मेरी सांसे तेज हो गई। शर्म के मारे मैं दोहरी हो गई। उसके हाथ अब मेरी छोटी छोटी चूंचियों पर आ गये थे जो पहले ही कठोर हो गई थी। निपल जैसे कड़े हो कर फ़टे जा रहे थे। उसके हाथों तक मेरे दिल की धड़कन महसूस हो रही थी। शरीर में मीठा मीठा सा जहर भरा जा रहा था। उसके अंगुली और अंगूठे के बीच मेरे निपल दब गये। उसे वो हल्के से मसल रहा था। मेरी सिसकियां मुख से अपने आप ही निकल पड़ी। मन कर रहा था कि बस मुझे ऐसा मजा मिलता ही रहे। दिल की कोयलिया पीहू पीहू कर कूक उठी थी।

उसका मैंने जरा भी विरोध नहीं किया। मैंने पास के पेड़ के तने से लिपट गई। उसका हाथ अब मेरे छोटे से चूतड़ो पर था। ढीले पजामे में मेरे चूतड़ के गोले नरम नरम से जान पड़े… कैसी मीठी सिरहन पैदा हो गई। मैं ऊपर से नीचे तक सिहर उठी।

“चलो, वहीं चल कर कर बैठते हैं … वो दोनों तो अपने आप में खोये हुये हैं। मैंने शरम से झुकी अपनी बड़ी बड़ी आंखे उठा कर रोनी को देखा… उसका लण्ड बहुत जोर मार रहा था। उसके हाल पर मुझे दया भी आई… मेरी हालत भी सच में दया के काबिल थी…। हम दोनों वापस दरी पर जाकर बैठ गये। वहां कोई नहीं था, शायद वो चुदाई में लगे थे। उनकी चुदाई के बारे में सोच कर ही मुझे शर्म आने लगी थी।

रोनी ने मेरा कंधा हाथ से थाम लिया और मुझे जोर लगा कर लेटा दिया। उसने मुझे अपने नीचे धीरे से दबा लिया और अपने अधर मेरे अधरों पर रख दिये। मैंने भी सोचा कि अब ज्यादा नखरे दिखाने से कोई फ़ायदा नहीं है… मेरे साथ की सहेलियां तो मस्ती से चुदवा रही है… मैं भी जवानी का मधुर मजा ले लूँ। यह सोच कर मैंने अपने आपको रोनी के हवाले कर दिया। रोनी को भी लगा कि अब विरोध समाप्त होता जा रहा है … और मैं चुदने के लिये मन से राजी हूं तब वो मुझ पर छाने लगा। मेरी आंखे उन्माद में बन्द होने लगी थी।

रोनी ने कब अपने कपड़े उतार लिये मुझे पता ही नहीं चला। वो मेरे कपड़े भी एक एक करके उतारने लगा। जब ब्रा की बारी आई तो मैं शर्म से लाल हो गई थी। मेरे रोकते रोकते भी ब्रा उतर चुकी थी। मैंने दोनों हाथ आगे करके अपनी चूंचियां छुपा ली। पर अब मेरी पैन्टी को कौन सम्भालता। उसने उसे भी खींच कर उतार दी… मेरी चूत अब नीले गगन के तले खुली हुई थी। मैंने अपनी चूत छुपाई तो मेरी चूंचियां पहाड़ की तरह सीधी तनी हुई सामने आ गई। मेरे जवान जिस्म के कटाव और उभार रोनी पर तलवार की भांति वार कर रहे थे।

मेरा कसा हुआ सुन्दर जिस्म था। चिकना और लुनाई से भरा हुआ चमकता हुआ जिस्म।

शायद दोनों से बहुत सुन्दर, उत्तेजना से भरा हुआ, कसकता हुआ शरीर।

“मर गई मेरी मां !!! मुझे बचा लो कोई…” उसका हाथ मेरी चूंचियों पर आ गया था। मैं नीचे दबी हुई शर्म से घायल हुई जा रही थी।

“कोमल जी… आपकी छाती तो बुरी तरह धड़क रही है…”

“रोनी… अब बस करो ना … देखो तुमने मेरा कैसा हाल कर दिया है… छोड़ दो मुझे !”

मेरी चूत जैसे लण्ड लेने के लिये बेकाबू होती जा रही थी। मेरी उलझी हुई लटें अब वो समेट रहा था। उसने जल्दी से कण्डोम निकाला और लण्ड पर पहनाने लगा। मैंने तुरन्त ही उसे छीन कर एक तरफ़ फ़ेंक दिया। वो समझ गया कि मैं अपनी चुदाई में नंगा लण्ड खाना चाहती हूं। उसका कड़क लण्ड मेरे अनछुई योनि-द्वार पर दस्तक दे रहा था। मेरी चूत पानी छोड़ छोड़ कर बेहाल हो रही थी। रोनी का भार मेरे शरीर पर बढ़ चला। उसका लण्ड ने बड़ी सज्जनता से चूत में प्रवेश कर गया। मैंने अपने वासना के मारे अपने होंठ काट लिये। रोनी को अपनी ओर दबा लिया। उसका लण्ड मोटा और लम्बा था। सुपाड़ा भी नरम और गद्देदार था।

“मुझे अपना लो रोनी… घुसा डालो… अब ना तड़पाओ मुझे…” मेरे मुख से अस्पष्ट से शब्द फ़ूट पड़े। उसका लण्ड धीरे धीरे से अन्दर की ओर बढ़ चला। वहां वह रुक गया… फिर हल्का सा जोर लगाया। मुझे चूत में हल्का सा दर्द हुआ। फिर और आगे बढ़ा… दर्द और बढ़ा। अब वो रुक सा गया… मुझे प्यार करने लगा। मेरी चूंचियां सहलाने लगा। मुझमें उत्तेजना बढ़ती गई। उसका हल्का जोर और लगा …

थोड़ा सा दर्द और हुआ… यूं धीरे धीरे करते करते उसका लण्ड मेरी चूत में पूरा फ़िट हो गया। तभी मेरी चूत से खून की धार सी निकल पड़ी… मुझे गीलापन लगने लगा था, पर मुझे यह भी मालूम था कि मेरी झिल्ली फ़ट चुकी है, पर दर्द अधिक नहीं हुआ। शायद ये प्यार से लण्ड को भीतर उतारने के कारण था। अगला शॉट भी बहुत ही हौले से उतारा। मुझे तो पहली बार में ही चुदाई दिल को भाने वाली लगी। कली खिल चुकी थी। भंवरे ने डंक मार दिया था और अब वो कली का यौवन रस पी रहा था। फ़ूल खिलने को बेताब था। अपनी पंखुड़ियां खोले भंवरे को कैद करने के प्रयत्न में था।

तभी मुझे अपनी साथियों की तालियां और हंसी सुनाई दी। वो चारों हम दोनों के घेरे खड़े थे… पर क्या करती… रोनी का लण्ड चूत में पूरा घुसा हुआ था। मैं मुस्कराती हुई शर्म से रोनी को खींच कर अपना चेहरा छुपाने की कोशिश करने लगी। फिर नहीं बना तो हाथों से मैंने अपना चेहरा छिपा लिया। रोनी के धक्के अब चल पड़े थे… हर धक्के पर सभी साथी ताली बजा कर मेरा और रोनी का उत्साह बढ़ा रहे थे। तभी मैंने देखा बबलू ने अपने लण्ड पर, मुझे देख कर मुठ मारने लगा था। कुछ ही देर में मंजू ने उसका लण्ड थाम लिया और बबलू की मुठ मारने लगी। तभी मुन्ना का भी छोटा सा और सलोना लण्ड नैना ने पकड़ कर चलाने लगी।

मुझे ये समां बहुत प्यारा लग रहा था। सभी मेरा साथ दे रहे थे। धीरे धीरे मेरी शर्म भी समाप्त होने लगी। मैं भी सबकी ताल में ताल मिलाने लगी। नीचे से अपनी चूत उछालने की कोशिश करने लगी। पर उछाल नहीं पाई, मुझे ऐसा कोई अनुभव नहीं था। पर शरीर में वासना भरी तरंगें चलने लगी थी। मेरा जिस्म जैसे काम देवता की गिरफ़्त में आ चुका था, मुझे आसपास आती हुई आवाजें भी सुनाई देना बन्द हो गई थी। बस चुदाई का सुनहरा आलम मुझ पर छा गया था। मैं आनन्द के सुख सागर में गोते खाने लगी थी। रोनी का लण्ड भचाभच मुझे चोद रहा था। तभी जैसे मेरा जिस्म जैसे तरावट से भर गया और लगा कि जैसे चूत में मिठास भर गई हो… एक सिसकी के साथ मेरा रति-रस छूट पड़ा। तभी रोनी भी का लण्ड भी मेरी चूत से बाहर आ गया और वो मुठ मारने लगा। मैंने अपना मुख खोल कर ज्योहीं एक भरपूर सांस ली मेरा मुख वीर्य की पिचकारियों से नहा उठा।

रोनी के साथ साथ मुन्ना और बबलू भी अपने लण्ड की पिचकारियां मेरे मुख की ओर निशाना साध कर छोड़ रहे थे। नैना और मन्जू ने जल्दी से तौलिये से मेरा मुख साफ़ कर दिया। दरी पर मेरी चूत से निकला हुआ खून भी था। दरी को नदी में धो कर सूखने को डाल दिया।

कुछ ही देर में हम सभी साथ बैठ कर हंसी मजाक कर रहे थे। लन्च समाप्त करके हम सभी फिर से नदी में मस्ती करने का कार्यक्रम बना रहे थे।

“आज तो हमारी नई दोस्त कोमल का भी उदघाटन हुआ है… आज सभी उसे खुश करेंगे !”

“तो चलो, सामने का तो उदघाटन हो चुका है, अब पिछवाड़ी का नम्बर लगाते हैं… !”

“कोमल जी, आप कहे … आप किससे उदघाटन करवायेंगी…?”

“चलो हटो जी… मुझे कुछ नहीं करवाना… वो तो ये सब अपने आप हो गया था… सारा कसूर तो नैना का है… उसी ने मुझे फ़ंसा दिया था !”

“अरे कोमल, लड़की हो तो चुदना तो पड़ेगा ही ना… आज नहीं तो कल… किसी को दोष ना दो !”

“चलो, अब नदी में चलें… नंगे हो कर नहायेंगे…” सभी हुर्रे कहते हुये कपड़े उतार कर नदी में कूद पड़े… मुझे भी मन्जू धक्का देकर ले चली। पर मैंने अपनी ब्रा और पैन्टी पहन ली थी। मंजू और नैना तो बेशर्म हो कर नंगी हो हर नाच रही थी। अचानक मुन्ना ने मुझे पानी में खींच लिया। मैं हड़बड़ा कर उसकी बाहों में सिमटती चली गई। यह देख कर मन्जू रोनी से लिपट गई और नैना ने अपना साथी बबलू को बना लिया। मुन्ना ने मुझे पानी के भीतर कमर तक ले लिया और मेरे जिस्म से खेलने लगा। मुझे ये सेक्स विहार रोमांचित कर गया। आज ही पहली चुदाई और फिर अब पानी में भी चुदाई। मुन्ना ने मेरी पैन्टी उतार दी और मेरी गाण्ड से चिपक गया। उसका लण्ड रोनी जैसा मोटा और लम्बा तो नहीं था, छः इन्च लम्बा तो होगा ही। उसके लण्ड के स्पर्श से मैं फिर रोमांचित हो उठी। मेरे दोनों चिकने चूतड़ के गोलों के बीच वो घुसा जा रहा था।

“मुन्ना… ऐसे नहीं कर… बस नहाते हैं…”

“अरे नहीं कोमल, आज तो तेरी गाण्ड का भी मारनी है… बिलकुल अभी… चल पानी में ही गाण्ड चुदवा ले… देखना मजा बहुत आयेगा !”

“पर मुझे लाज आती है … फिर कभी !” मैंने शर्माते हुये कहा। मन तो गाण्ड चुदवाने का कर रहा था, पहला मौका जो था, लग रहा था … पूरे मजे ले लो, पता नहीं जिन्दगी में कभी नसीब हो ना हो। पर मेरा शरमाना काम नहीं आया… उसका लिन्ग मेरी गाण्ड के छेद पर चिपक चुका था, पर एक हल्के जोर की आवश्यकता थी।

मेरी गाण्ड में गुदगुदी सी हुई। मैं पानी में झुकती चली गई।

“मुन्ना, प्यार से लण्ड घुसाना, नया माल है… देख मजा आना चाहिये…” रोनी ने हांक लगाई।

“अरे मरने दो ना… चुद चुद कर वो अपने आप हमारी जैसी हो जायेगी…” मंजू ने रोनी को टोक दिया।

मुन्ना ने कहा,”मैंने लाल निशान देख लिया था।… प्यार से उदघाटन करूंगा !” मुन्ना हंस कर बोला। मेरा मन विचलित हो उठा। मुन्ना के लण्ड का जोर पर गाण्ड पर बढ़ता गया। मैंने भी अपनी गाण्ड का छेद ढीला छोड़ दिया। मुन्ना का लण्ड फ़ुफ़कारता हुआ अपनी विजय पताका फ़हराता हुआ अन्दर जा घुसा। मेरे बदन में एक दर्द भरी मीठी सी लहर दौड़ गई। सभी साथियों ने लण्ड प्रवेश पर तालियाँ बजा कर मेरा अभिवादन किया। मैं शर्म से जैसे मर गई। पर फिर भी इतनी तसल्ली तो थी ना ! पहले की तरह खुली चुदाई नहीं थी, बल्कि पानी के अन्दर थी। सो मैंने भी धीरे से हाथ लहरा कर सभी की बधाई स्वीकार की… सभी साथी अपने काम धन्धे पर लग गए। अब उन सबका ध्यान स्वयं की चुदाईयों पर था। बबलू और रोनी का ने अपना ध्यान मन्जू और नैना को चोदने में केंद्रित कर लिया था। उसका दुबला पतला सा लण्ड मेरी गाण्ड में गजब की मिठास भर रहा था। मेरी चूत गाण्ड मराने की गर्मी से फिर लण्ड मांगने लग गई थी। लण्ड पतला होने से मुझे गाण्ड में बिल्कुल नहीं लग रही थी, वो तो सटासट चल रहा था। मैंने रोनी की तरफ़ देखा और उसे इशारा किया…।

रोनी मंजू को छोड़ कर मेरे पास आ गया। वो समझ गया था कि चूत में सोलिड वाला लण्ड चाहिये था। मुन्ना लपक कर मंजू को चोदने चला गया। रोनी ने अपना मोटा और लम्बा लण्ड पीछे से ही मेरी चूत में प्रवेश करा दिया। मेरा दिल बल्लियों उछलने लगा। फिर एक बार और रसभरी चुदाई चल पड़ी। पानी के अन्दर छप-छप का शोर हमें और भी मस्त किये दे रहा था। कुछ ही देर में मैं झड़ गई। पर रोनी अभी भी टनाटन था। रोनी के मोटे लण्ड ने मेरी चूत दो बार चोद दी थी। उसकी चुदाई बहुत ही सुन्दर थी। इधर मुन्ना झड़ चुका था और रोनी अपना वीर्य निकालने के लिये फिर से मंजू के पास आ गया था।

हम सभी अब अपने अपने कपड़े पहन रही थी और मेक-अप कर रही थी। सारा सामान वो कार में साथ लेकर आई थी। उन्हें इन सभी चीजों का पुराना अनुभव जो था। कुछ ही समय में हम सभी बहुत ही सभ्य और गरिमामय लोग लग रहे थे। कार घर की तरफ़ लौट पड़ी। रास्ते में हमने कोल्ड ड्रिन्क भी पी… और आज की रंगीन पिकनिक के बारे में बतियाते रहे। उनका मुख्य बिन्दु मेरी चुदाई ही थी। सभी ने आज की मेरी सफ़ल चुदाई पर रात को होटल में डिनर का आमंत्रण दिया… मैं बहुत ही खुश थी आज की चुदाई को लेकर…

आपकी

नेहा वर्मा

अक्षिता शर्मा

Jan 092010
 

दीदी की तड़प

प्रेषक : संतोष कुमार

सबसे पहले तो मैं गुरूजी को धन्यवाद कहना चाहूँगा कि उन्होंने हमें अपने उदास और वीरान जीवन में अन्तर्वासना की रंगीनियाँ भरने का मौका दिया। मैं पिछले दो सालों से अन्तर्वासना को रोज़ ही देखता हूँ। कुछ कहानियां तो अच्छी होती हैं पर कुछ तो बिल्कुल ही बकवास होती हैं जिन्हें सिर्फ और सिर्फ समय की बर्बादी ही कहा जा सकता है। खैर जो भी हो, सब चलता है….

मैं अपना परिचय करवा दूँ ! मेरा नाम कुमार है, उम्र अभी २६ साल है। वैसे तो मैं कोलकाता का रहने वाला हूँ पर जॉब की वजह से अभी दिल्ली में हूँ। मैं साधारण कद काठी का हूँ पर बचपन से ही जिम जाता हूं इसलिए अभी भी मेरी बॉडी अच्छे आकार में है । बाकी बॉडी के बारे में धीरे धीरे पता चल जायेगा।

मैं जो कहानी आपसे बाँटने जा रहा हूँ वो सच्ची है या झूठी, यह आप ही तय करना।

बात उन दिनों की है जब मैंने अपनी स्नातिकी पूरी की थी। उस वक़्त मेरी उम्र २१ थी। मैं अपने मम्मी-पापा और अपनी बड़ी बहन के साथ कोलकाता में एक किराये के मकान में रहता था। मेरे पापा उस वक़्त सरकारी जॉब में थे। माँ घर पर ही रहती थीं और हम भाई-बहन अपनी अपनी पढ़ाई में लगे हुए थे। मेरी और मेरी बहन की उम्र में बस एक साल का फर्क है। इसलिए हम दोस्त की तरह रहते थे। हम दोनों अपनी सारी बातें एक दूसरे से कर लेते थे, चाहे वो किसी भी विषय में हो।

मैं बचपन से ही थोड़ा ज्यादा सेक्सी था और सेक्स की किताबों में मेरा मन कुछ ज्यादा लगता था। पर मैं अपनी पढ़ाई में हमेशा अव्वल रहता था इसलिए मुझसे सारे लोग काफी खुश रहते थे।

हम जिस किराये के मकान में रहते थे उसमें दो हिस्से थे, एक में हम और दूसरे में एक अन्य परिवार रहता था, जिसमें एक पति-पत्नी और उनके दो बच्चे रहते थे। दोनों काफी अच्छे स्वभाव के थे और हमारे घर-परिवार में मिलजुल कर रहते थे। मेरी माँ उन्हें बहुत प्यार करती थीं। मैं भी उन्हें अपनी बड़ी बहन की तरह ही मानता था और उनके पति को जीजा कहता था। उनके बच्चे मुझे मामा मामा कहते थे।

सब कुछ ठीक ठाक ही चल रहा था। अचानक मेरे पापा की तबीयत कुछ ज्यादा ही ख़राब हो गई और उन्हें अस्पताल में दाखिल करवाना पड़ा। हम लोग तो काफी घबरा गए थे पर हमारे पड़ोसी यानि कि मेरे मुँहबोले जीजाजी ने सब कुछ सम्हाल लिया। हम सब लोग अस्पताल में थे और डॉक्टर से मिलने के लिए बेताब थे। डॉक्टर ने पापा को चेक किया और कहा की उनके रीढ़ की हड्डी में कुछ परेशानी है और उन्हें ऑपरेशन की जरूरत है। हम लोग फ़िर से घबरा गए और रोने लगे। जीजाजी ने हम लोगों को सम्हाला और कहा कि चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है सब ठीक हो जायेगा। उन्होंने डॉक्टर से सारी बात कर ली और हम सब को घर जाने के लिए कहा। पहले तो हम कोई भी घर जाने को तैयार नहीं थे पर बहुत कहने पर मैं, मेरी बहन और अनीता दीदी मान गए, अनीता मेरी मुँहबोली बहन का नाम था।

हम तीनों लोग घर वापस आ गए। रात जैसे तैसे बीत गई और सुबह मैं अस्पताल पहुँच गया। वहां सब कुछ ठीक था। मैंने डॉक्टर से बात की और जीजा जी से भी मिला। उन लोगों ने बताया कि पापा की शूगर थोड़ी बढ़ी हुई है इसलिए हमें थोड़े दिन रुकना पड़ेगा, उसके बाद ही उनकी सर्जरी की जायेगी। बाकी कोई घबराने वाली बात नहीं थी। मैंने माँ को घर भेज दिया और उनसे कहा कि अस्पताल में रुकने के लिए जरूरी चीजें शाम को लेते आयें। माँ घर चली गईं और मैं अस्पताल में ही रुक गया। जीजा जी भी अपने ऑफिस चले गए।

जैसे-तैसे शाम हुई और माँ सारी चीजें लेकर वापस अस्पताल आ गईं। हमने पापा को एक निजी कमरे में रखा था जहाँ एक और बिस्तर था परिचारक के लिए। माँ ने मुझसे घर जाने को कहा। मैं अस्पताल से निकला और टैक्सी स्टैंड पहुँच गया। मैंने वहाँ एक सिगरेट ली और पीने लग। तभी मेरी नज़र वहीं पास में एक बुक-स्टाल पर चली गई। मैंने पहले ही बताया था कि मुझे सेक्सी किताबें, खासकर मस्त राम की किताबों का बहुत शौक है। मैं उस बुक-स्टाल पर चला गया और कुछ किताबें खरीदी और अपने घर के लिए टैक्सी लेकर निकल पड़ा।

घर पहुंचा तो मेरी बहन ने जल्दी से आकर मुझसे पापा के बारे में पूछा और तभी अनीता दीदी भी अपने घर से बाहर आ गईं और पापा की खबर पूछी। मैंने सब बताया और बाथरूम में चला गया। सारा दिन अस्पताल में रहने के बाद मुझे फ्रेश होने की बहुत जल्दी पड़ी थी। मैं सीधा बाथरूम में जाकर नहाने लगा। बाथरूम में जाने से पहले मैंने मस्तराम की किताबों को फ़्रिज पर यूँ ही रख दिया। हम दोनों भाई बहन ही तो थे केवल इस वक़्त घर पर, और उसे पता था मेरी इस आदत के बारे में। इसलिए मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया।

जब मैं नहा कर बाहर आया तो मेरी बहन को देखा कि वो किताबें देख रही है। उसने मुझे देखा और थोड़ा सा मुस्कुराई। मैंने भी हल्की सी मुस्कान दी और मैं अपने कमरे में चला गया। मैं काफी थक गया था इसलिए बिस्तर पर लेटते ही मेरी आँख लग गई।

रात के करीब ११ बजे मुझे मेरी बहन ने उठाया और कहा- खाना खा लो !

मैं उठा और हाथ मुँह धोकर खाने के लिए मेज़ पर गया, वहां अनीता दीदी भी बैठी थी। असल में आज खाना अनीता दीदी ने ही बनाया था। मैंने खाना खाना शुरू किया और साथ ही साथ टीवी चला दिया। हम इधर उधर की बातें करने लगे और खाना खा कर टीवी देखने लगे।

हम तीनों एक ही सोफे पर बैठे थे, मैं बीच में और दोनों लड़कियाँ मेरे आजू-बाजू । काफी देर बात चीत और टीवी देखने के बाद हम लोग सोने की तैयारी करने लगे। मैं उठा और सीधे फ़्रिज की तरफ गया क्यूंकि मुझे अचानक अपने किताबों की याद आई। मुझे वहां पर बस एक ही किताब मिली जबकि मैं तीन किताबें लेकर आया था। सामने ही अनीता दीदी बैठी थी इसलिए कुछ पूछ भी नहीं सकता था अपनी बहन से। खैर मैंने सोचा कि जब अनीता दीदी अपने घर में चली जाएँगी तो मैं अपनी बहन से पूछूंगा।

थोड़ी देर तक तो मैं अपने कमरे में ही रहा, फिर उठ कर बाहर हॉल में आया तो देखा मेरी बहन अपने कमरे में सोने जा रही थी, मैंने उसे आवाज़ लगाई,” नेहा, मैंने यहाँ तीन किताबें रखी थीं, एक तो मुझे मिल गई लेकिन बाकी दो और कहाँ हैं ?”

“मेरे पास हैं, पढ़कर लौटा दूंगी मेरे भैया !” और उसने बड़ी ही सेक्सी सी मुस्कान दी।

मैंने कहा,” लेकिन तुम्हें दो दो किताबों की क्या जरुरत है? एक रखो और दूसरी लौटा दो, मुझे पढ़नी है।”

उसने मेरी बात का कोई जवाब नहीं दिया और बस कहा कि आज नहीं कल दोनों ले लेना।

मैं अपना मन मारकर अपने कमरे में गया और किताब पढ़ने लगा। पढ़ते-पढ़ते मैंने अपना लण्ड अपनी पैन्ट से बाहर निकला और मुठ मारने लगा। काफी देर तक मुठ मारने के बाद मैं झड़ गया और अपने लण्ड को साफ़ करके सो गया।

रात को अचानक मेरी आँख खुली तो मैं पानी लेने के लिए हॉल में फ़्रिज के पास पहुंचा। जैसे ही मैंने फ़्रिज खोला कि मुझे बगल के कमरे से किसी के हंसने की आवाज़ सुनाई दी। मैंने ध्यान दिया तो पता लगा कि मेरी बहन के कमरे से उसकी और किसी और लड़की की आवाज़ आ रही थी। नेहा का कमरा हॉल के पास ही है। मैं उसके कमरे के पास गया और अपने कान लगा दिए ताकि मैं यह जान सकूँ कि अन्दर कौन है और क्या बातें हो रही हैं।

जैसे ही मैंने अपने कान लगाये मुझे नेहा के साथ वो दूसरी आवाज़ भी सुनाई दी। गौर से सुना तो वो अनीता दीदी थी। वो दोनों कुछ बातें कर रहे थे। मैंने ध्यान से सुनने की कोशिश की, और जो सुना तो मेरे कान ही खड़े हो गए।

अनीता दीदी नेहा से पूछ रही थी,” हाय नेहा, ये कहाँ से मिली तुझे? ऐसी किताबें तो तेरे जीजा जी लाते थे पहले, जब हमारी नई-नई शादी हुई थी !”

“अच्छा तो आप पहले भी इस तरह की किताबें पढ़ चुकी हैं ?”

“हाँ, मुझे तो बहुत मज़ा आता है। लेकिन अब तेरे जीजू ने लाना बंद कर दिया है। और तुझे तो पता है कि मैं थोड़ी शर्मीली हूँ इसलिए उन्हें फिर से लाने को नहीं कह सकती, और वो हैं कि कुछ समझते ही नहीं।”

“कोई बात नहीं दीदी, जब भी आपको पढ़ने का मन करे तो मुझसे कहना, मैं आपको दे दूंगी।”

“लेकिन तेरे पास ये आई कहाँ से ?”

“अब छोड़ो भी न दीदी, तुम बस आम खाओ, पेड़ मत गिनो।”

“पर मुझे बता तो सही !”

“लगता है तुम नहीं मानोगी !”

“मैं कितनी जिद्दी हूँ, तुझे पता है न। चल जल्दी से बता !”

“तुम पहले वादा करो कि तुम किसी को भी नहीं बताओगी !”

“अरे बाबा, मुझ पर भरोसा रखो, मैं किसी को भी नहीं बताउंगी।”

“ये किताबें सोनू लेकर आता है।’

” हे भगवान् ..” अनीता दीदी के मुँह से एक हल्की सी चीख निकल गई,” तू सच कह रही है ? सोनू लेकर आता है ?”

नेहा उनकी शकल देख रही थी,”तुम इतना चौंक क्यूँ रही हो दीदी ?”

अनीता दीदी ने एक लम्बी साँस ली और कहा,” यार, मैं तो सोनू को बिलकुल सीधा-साधा और शरीफ समझती थी। मुझे तो यकीन ही नहीं हो रहा कि वो ऐसी किताबें भी पढ़ता है।”

” इसमें कौन सी बुराइ है दीदी, आखिर वो भी मर्द है, उसका भी मन करता होगा !”

” हाँ यह तो सही बात है !” दीदी ने मुस्कुराते हुए कहा,” लेकिन एक बात बता, ये किताब पढ़कर तो सारे बदन में हलचल मच जाती है, फिर तुम लोग क्या करते हो ? कहीं तुम दोनों आपस में ही तो…….??”

अनीता दीदी की आवाज़ में एक अजीब सा उतावलापन था। उन्हें शायद ऐसा लग रहा था कि हम भाई-बहन आपस में ही चुदाई का खेल न खेलते हों।

इधर उन दोनों की बातें सुनकर मेरी आँखों की नींद ही गायब हो गई। मैंने अब हौले से अन्दर झांका और उन्हें देखने लगा। वो दोनों बिस्तर पर एक दूसरे के साथ लेटी हुई थी और दोनों पेट के बल लेट कर एक साथ किताब को देख रही थीं।

तभी दीदी ने फिर पूछा,” बोल न नेहा, क्या करते हो तुम दोनों ?” अनीता दीदी ने नेहा की बड़ी बड़ी चूचियों को अपने हाथो से मसल डाला।

” ऊंह, दीदी….क्या कर रही हो ? दर्द होता है..” नेहा ने अपने उरोजों को अपने हाथों से सहलाया और अनीता दीदी की तरफ देख कर मुस्कारने लगी।

अनीता दीदी की आँखों में एक शरारत भरी चमक थी और एक सवाल था…. नेहा ने उनकी तरफ देखा और कहा,” आप जैसा सोच रही हैं वैसा नहीं है दीदी। हम भाई-बहन चाहे जितने भी खुले विचार के हों, पर हमने आज तक अपनी मर्यादा को नहीं लांघा है। हमारा रिश्ता आज भी वैसे ही पवित्र है जैसे एक भा बहन का होता है।”

यह सच भी है, हम भाई-बहन ने कभी भी अपनी सीमा को लांघने की कोशिश नहीं की थी। खैर, अनीता दीदी ने नेहा के गलों पर एक चुम्बन लिया और कहा,” मैं जानती हूँ नेहा, तुम दोनों कभी भी ऐसी हरकत नहीं करोगे।”

“अच्छा नेहा एक बात बता, जब तू यह किताब पढ़ती है तो तुझे मन नहीं करता कि कोई तेरे साथ कुछ करे और तेरी चूत को चोद-चोद कर शांत करे, उसकी गर्मी निकाले ?” अनीता दीदी के चेहरे पर अजीब से भाव आ रहे थे जो मैंने कभी भी नहीं देखा था। उनकी आँखे लाल हो गई थीं।

“हाय दीदी, क्या पूछ लिया तुमने, मैं तो पागल ही हो जाती हूँ। ऐसा लगता है जैसे कहीं से भी कोई लंड मिल जाये और मैं उसे अपनी चूत में डाल कर सारी रात चुदवाती रहूँ !”

“फिर क्या करती हो तुम ?”

नेहा ने एक गहरी सांस ली और कहा,” बस दीदी, कभी कभी ऊँगली या मोमबत्ती से काम चला लेती हूँ !”

दीदी ने नेहा को अपने पास खींच लिया और उसके होठों पर एक चुम्मा धर दिया। नेहा को भी अच्छा लगा। दोनों ने एक दूसरे को पकड़ लिया और सहलाना शुरू कर दिया।

यहाँ बाहर मेरी हालत ऐसी हो रही थी जैसे मैं तेज़ धूप में खडा हूँ, मैं पसीने पसीने हो गया था और मेरे लंड की तो बात ही मत करो एक दम खड़ा होकर सलामी दे रहा था। मैंने फिर उनकी बातें सुननी शुरू कर दी।

तभी अचानक मैंने देखा कि अनीता दीदी ने नेहा की टी-शर्ट के अन्दर अपना हाथ डाल दिया और उसकी चूचियों को पकड़ लिया और धीरे धीरे सहलाने लगी। नेहा को बहुत मज़ा आ रहा था। उसके मुँह से प्यार भरी सिस्कारियां निकल रही थी।

“ऊफ दीदी….मुझे कुछ हो रहा है……आपकी उँगलियों में तो जादू है।”

फिर अनीता दीदी ने पूछा,” अच्छा नेहा एक बात बता, तूने कभी किसी लण्ड से अपनी चूत की चुदाई करवाई है क्या ?”

“नहीं दीदी, आज तक तो मौका नहीं मिला है। आगे भगवान् जाने कौन सा लण्ड लिखा है मेरे चूत की किस्मत में।” नेहा अपनी आँखें बंद करके बाते किये जा रही थी,” दीदी, तुमने तो खूब चुदाई करवाई होगी अपनी, बहुत मज़े लिए होंगे जीजाजी के साथ…. बताओ न दीदी कैसा मज़ा आता है जब सचमुच का लण्ड अन्दर जाता है तो ….?”

“यह तो तुझे खुद ही महसूस करना पड़ेगा मेरी बन्नो रानी…. इस एहसास को शब्दों में बताना बहुत मुश्किल है…”

“हाय दीदी मुझे तो सच में जानना है कि कैसा मज़ा आता है इस चूत की चुदाई में …. तुमने तो बहुत मज़े किये है जीजाजी के साथ, बोलो न कैसे करते हो आप लोग? क्या जीजा जी आपको रोज़ चोदते हैं?”

तभी अनीता दीदी थोड़ा सा उदास हो गई और नेहा की तरफ देख कर कहा,”अब तुझे क्या बताऊँ, तेरे जीजा जी तो पहले बहुत रोमांटिक थे । मुझे एक मिनट भी अकेला नहीं छोड़ते थे। जब भी मन किया मुझे जहाँ मर्ज़ी वहा पटक कर मेरी चूत में अपना लंड डाल देते थे और मेरी जमकर धुनाई करते थे।”

“क्या अब नहीं करते ?” नेहा ने पूछा।

“अब वो पहले वाली बात नहीं रही, अब तो तेरे जिज्जाजी को टाइम ही नहीं मिलता और मैं भी अपने बच्चों में खोई रहती हूँ। आज कल तेरे जिज्जाजी मुझे बस हफ़्ते एक या दो बार ही चोदते हैं वो भी जल्दी जल्दी से, मेरी नाइटी उठा कर अपना लंड मेरी चूत में डाल कर बस १० मिनट में ही लंड का माल चूत में झाड़ देते हैं।”

यह बात सुनकर मेरा दिमाग ठनका। मैंने पहले कभी भी अनीता दीदी को सेक्स की नज़रों से नहीं देखा था। अब मेरे दिमाग में कुछ शैतानी घूमने लगी। मैं मन ही मन उनके बारे में सोचने लगा….। ऐसा सोचने से ही मेरा लंड अब बिल्कुल स्टील की रॉड की तरह खड़ा हो गया।

अनीता दीदी को उदास देख कर नेहा ने उनके गालों पर एक चुम्मा लिया और कहा,” उदास न हो दीदी, अगर मैं कुछ मदद कर सकूँ तो बोलो। मैं तुम्हारे लिए कुछ भी करुँगी, मेरा वादा है तुमसे।”

दीदी हल्के से मुस्कुराई और कहा,” मेरी प्यारी बन्नो, जब जरूरत होगी तो तुझसे ही तो कहूँगी, फिलहाल अगर तू मेरी मदद करना चाहती है तो बोल !”

“हाँ हाँ दीदी, तुम बोलो मैं क्या कर सकती हूँ ?”

“चल आज हम एक दूसरे को खुश करते हैं और एक दूसरे का मज़ा लेते हैं….” नेहा थोड़ा सा मुस्कुराई और अनीता दीदी को चूम लिया।

अनीता दीदी ने नेहा को बिस्तर से उठने के लिए कहा और खुद भी उठ गई। दोनों बिस्तर पर खड़े होकर एक दूसरे के कपड़े उतारने लगी। नेहा की पीठ मेरी तरफ थी और अनीता दीदी का चेहरा मेरी तरफ। नेहा ने अनीता दीदी की नाईटी उतार दी और दीदी ने उसकी टी-शर्ट।

हे भगवान् ! मेरे मुँह से तो सिसकारी ही निकल गई, आज से पहले मैंने अनीता दीदी को इतना खूबसूरत नहीं समझा था। वो बिस्तर पर सिर्फ अपनी ब्रा और पैंटी में खड़ी थी। दूधिया बदन , सुराहीदार गर्दन, बड़ी बड़ी आँखें, खुले हुए बाल और गोरे गोरे जिस्म पर काली ब्रा जिसमे उनके 36 साइज़ के दो बड़े बड़े उरोज ऐसे लग रहे थे जैसे किसी ने दो सफेद कबूतरों को जबरदस्त कैद कर दिया हो। उनकी चूचियां बाहर निकलने के लिए तड़प रही थीं। चूचियों से नीचे उनका सपाट पेट और उसके थोड़ा सा नीचे गहरी नाभि, ऐसा लग रहा था जैसे कोई गहरा कुँआ हो। उनकी कमर २६ से ज्यादा किसी भी कीमत पर नहीं हो सकती। बिल्कुल ऐसी जैसे दोनों पंजो में समां जाये। कमर के नीचे का भाग देखते ही मेरे तो होंठ और गला सूख गया। उनकी गांड का साइज़ ३६-३७ के लगभग था। बिल्कुल गोल और इतना ख़ूबसूरत कि उन्हें तुंरत जाकर पकड़ लेने का मन हो रहा था। कुल मिलाकर वो पूरी सेक्स की देवी लग रही थीं…..

हे भगवान् मैंने आज से पहले उनके बारे में कभी भी नहीं सोचा था।

इधर नेहा के कपड़े भी उतार चुकी थी और वो भी ब्रा और पैंटी में आ चुकी थी। उसका बदन भी कम सेक्सी नहीं था। 32 / 26/ 34…वो भी ऐसी थी किसी भी मर्द के लंड को खड़े खड़े ही झाड़ दे।

“हाय नेहा, तू तो बड़ी खूबसूरत है रे, आज तक किसी ने भी तुझे चोदा कैसे नहीं। अगर मैं लड़का होती तो तुझे जबरदस्ती पटक कर तुझे चोद देती।”

“ओह दीदी, आप के सामने तो मैं कुछ भी नहीं, पता नहीं जिज्जाजी आपको क्यूँ नहीं चोदते ..”

“उनकी बातें छोडो, वो तो हैं ही बेवकूफ !” अनीता दीदी ने नेहा की ब्रा खोल दी और नेहा ने भी हाथ बढ़ा कर दीदी की ब्रा का हुक खोल दिया।

मेरी तो सांस ही रुक गई, इतने सुन्दर और प्यारे उरोज मैंने आज तक नहीं देखे थे। अनीता दीदी के दो बच्चे थे पर कहीं से भी उन्हें देख कर ऐसा नहीं लगता था कि दो-दो बच्चों ने उनकी चूचियों से दूध पिया होगा….

खैर, अब नेहा की बारी थी तो दीदी ने उसकी ब्रा का हुक भी खोल दिया और साथ ही साथ उसकी पैंटी को भी उसके बदन से नीचे खिसकाने लगी। दीदी का उतावलापन देख कर ऐसा लग रहा था जैसे उन्हें कई जन्मों की प्यास हो।

नेहा ने भी वैसी ही फुर्ती दिखाई और अनीता दीदी के पैंटी को हाथों से निकालने के लिए खींच दिया।

संगेमरमर जैसी चिकनी जांघों के बीच में फूले हुए पावरोटी के जैसे बिल्कुल चिकनी और गोरी चूत को देखते ही मेरे लंड ने अपना माल छोड़ दिया……..

मेरे होठों से एक सेक्सी सिसकारी निकली आर मैंने दरवाज़े पर ही अपना सारा माल गिरा दिया…….मेरे मुँह से निकली सिसकारी थोड़ी तेज़ थी । शायद उन लोगों ने सुन ली थी, मैं जल्दी से आकर अपने कमरे में लेट गया और सोने का नाटक करने लगा। कमरे की लाइट बंद थी और दरवाज़ा थोड़ा सा खुला ही था। बाहर हॉल में हल्की सी लाइट जल रही थी जिसमें मैंने एक साया देखा। मैं पहचान गया। यह नेहा थी जो अपने बदन पर चादर डाल कर मेरे कमरे की तरफ ये देखने आई थी कि मैं क्या कर रहा हूँ और वो सिसकारी किसकी थी।

थोड़ी देर वहीं खड़े रहने के बाद नेहा अपने कमरे में चली गई और उसके कमरे का दरवाजा बंद हो गया, जिसकी आवाज़ मुझे अपने कमरे तक सुनाई दी। शायद जोर से बंद किया गया था। मुझे कुछ अजीब सा लगा, क्यूंकि आमतौर पर ऐसे काम करते वक़्त लोग सारे काम धीरे धीरे और शांति से करते हैं। लेकिन यह ऐसा था जैसे जानबूझ कर दरवाजे को जोर से बंद किया गया था। खैर जो भी हो, उस वक़्त मेरा दिमाग ज्यादा चल नहीं पा रहा था। मेरे दिमाग में तो बस अनीता दीदी की मस्त चिकनी चूत ही घूम रही थी।

थोड़ी देर के बाद मैं धीरे से उठा और वापस उनके दरवाज़े के पास गया, और जैसे ही मैंने अन्दर झाँका …….

दोस्तों, अब मैं ये कहानी यहीं रोक रहा हूँ। मुझे पता है आपको बहुत गुस्सा आएगा, कुछ खड़े लण्ड खड़े ही रह जायेंगे और कुछ गीली चूत गीली ही रह जायेगी। पर यकीन मानिये अभी तो इस कहानी की बस शुरुआत हुई है। अगर मुझे आप लोगों ने मेरा उत्साह बढ़ाया तो मैं इस कहानी को आगे भी लिखुंगा और सबके सामने लेकर आऊंगा।

वैसे भी यह मेरी पहली कहानी है अन्तर्वासना पर, तो मुझे यह भी देखना है कि मेरी कहानी छपती भी है या नहीं और लोगो को कितनी पसंद आती है। मुझे इन्तज़ार रहेगा आपके जवाब का। अगर आपको लगे कि यह कहानी आगे बढ़े तो मुझे अपने विचार भेजें।

Jan 092010
 

मास्टरजी

प्रेषिका : अंतरा सेन

नमस्कार !

आपकी अंतरा का सभी अन्तर्वासना के पाठकों को ढेर सारा धन्यवाद ! सबसे ज्यादा आभार तो गुरूजी का कि मेरी कहानी ” हवा में उड़ रही हूँ ! ” आप सब तक पहुंचाई !

तो दोस्तो, आप सब सोच रहे होंगे कि मैंने उस रात किसी तरह अपनी बुर मसलकर खुद को संभाल लिया पर मैं आगे की सोच रही थी।

उस रात के बाद से मैं जब भी मौका मिलता अपनी रांड माँ की नंगी रंगरेलियाँ जरूर देखती थी। मेरी बुर अब पानी छोड़ छोड़ कर प्यासी होती जा रही थी।

तो दोस्तो, मैंने अपना पहला शिकार अपने मास्टरजी को बनाया या शायद खुद ही बन गई !

मास्टरजी की उम्र ४०-४५ के आसपास थी लेकिन वो मस्त दीखते थे। जब से मैंने जवानी का खेल देखा था मेरा पढ़ाई में मन कम लगता था….

एक दिन मेरी सभी बहने माँ के साथ हमारे रिश्ते की मौसी के घर गई हुई थी। मुझे घर सँभालने के लिए छोड़ दिया था। मैं गुस्से में थी, पर क्या करती, मनहूस जो थी। पिताजी शहर गए थे जोकि वो रोज सुबह जाने लगे थे।

ठीक दो बजे मास्टरजी आ गए।

मैंने बेमन से किताबे निकाली और मुँह फुला के मास्टरजी के सामने बैठ गई।

मास्टरजी ने पूछा- क्या बात है?

मैंने कहा- सब मुझे छोड़ के चले गए !

मास्टरजी- कोई बात नहीं, घर में रहना भी जरूरी है।

मैंने चिढ़कर कहा – मेरा रहना ही हर बार क्यूँ जरूरी है?

मास्टरजी- क्यूंकि तुम बाकी सब बहनों से ज्यादा सुन्दर हो ! सब डरते होंगे कि कहीं कोई तुम्हें चुरा के न ले जाये !

मैंने इस जवाब की उम्मीद नहीं की थी पर अच्छा लगा !

मैंने उनसे पूछा- आपको मैं सुन्दर लगती हूँ? मेरे पास तो कोई क्रीम- पाउडर नहीं है !

मास्टरजी- अरे पगली क्रीम तो वो लगाती हैं जो सुन्दर नहीं होती ! तू तो हूर है !

मैंने पूछा- ये हूर क्या होता है?

हूर परी को कहते हैं ! मास्टरजी ऐसा कह कर मेरी तरफ लालची नजरों से देखने लगे।

तभी मुझे ध्यान आया कि जल्दी में मैं अपने घर के कपड़ो में आ गई थी जोकि मेरे स्कूल की पुरानी शर्ट और स्कर्ट था। मेरे शर्ट की ऊपर की बटन टूट गई थी और मेरे पास कोई ब्रा नहीं थी। मतलब यह कि मास्टरजी ने मेरे जोबन का उभार देख लिया था। मैंने शरमा के नजरें नीची कर ली, मुझे बुर में गुदगुदी लगी।

मास्टरजी ने भी मौके को पहचान लिया था कि लौड़ी गरम है।

मास्टरजी ने मुझसे पूछा- घर में कोई नौकर हो तो पानी मंगवाओ !

मैंने कहा- कोई नहीं है, मैं ले आती हूँ !

मास्टरजी ने कहा- ठीक है !

मैं किचन में चली गई, मास्टरजी मेरे पीछे आ गए। जैसे ही मैं किचन में घुसी मुझे अपनी पीठ पर गर्म हाथ का स्पर्श मिला। मैंने मुड के देखा तो मास्टरजी मेरी पीठ सहला के बोले मन छोटा न कर, तेरा दिन भी आयेगा।

मैं कसमसाते हुए बोली- कभी नहीं आयेगा !

फिर मास्टरजी ने कहा- चाय बना दे !

मैं चाय बनाने लगी, मास्टरजी मेरी पीठ सहलाते जा रहे थे मुझे गुदगुदी लग रही थी और अच्छा भी।

मास्टरजी ने पीठ सहलाते हुए अपना हाथ मेरी गर्दन से लेके मेरी छातियों की और कर दिया आप मेरी शर्ट के ऊपर से उनका हाथ मेरी गोलाइयों को नाप रहा था। मैं कसमसाई पर न चाहते हुए भी मेरे चेहरे पे मुस्कान आ गई जिसे उन्होंने पढ़ लिया। अब उन्होंने मेरे कंधे पे दोनों हाथ रख के मेरा चेहरा अपनी तरफ किया और मेरे चेहरे पे दोनों हाथ फिराने लगे। मुझे अजीब लगा क्यूंकि रामू या पिताजी ने माँ के साथ ऐसा कभी नहीं किया था।

मुझे अच्छा लगा तो मैं मास्टरजी से लिपट गई। मास्टरजी फिर से मेरी चूचियों को सहलाने लगे। फिर उन्होंने मुझे गोद में उठा लिया और पूछा- तुम्हारा बिस्तर कहाँ है?

मैंने उन्हें बताया और हम बेडरूम में आ गए।

मैंने कहा- आपकी चाय !

उन्होंने कहा- रहने दो ! जाओ, गैस बंद करके आ जाओ !

मैं गैस बंद करके आ गई और बेडरूम में मास्टरजी के सामने बैठ गई। मास्टरजी ने मुझे खींच के गले लगाया और मेरे गले में एक चुम्मा दिया। मैं गरम हो रही थी। फिर वो मेरे गाल चूमने लगे। मैं उनकी पीठ पर हाथ फिराने लगी। फिर उन्होंने मेरी शर्ट उतार दी। मेरी छातियाँ नंगी उनके सामने थिरक रही थी। अब मुझे लगा कुछ गड़बड़ हो सकती है पर तब तक उनके हाथ मेरे चुचूक मसलने लगे थे। मैं समझ ही नहीं पाई कि मास्टरजी मेरी दायीं चूची को चूसने लगे। मैं पिघल रही थी, मुझे ख़ुशी भी हो रही थी कि आज मुझे लंड मिलेगा। घर पर कोई नहीं था तो मैं भी मस्त थी।

मास्टरजी ने मेरी चूचियों को चूसने के बाद मसलना चालू किया तो मैं सिसकने लगी। वो मेरी चूचियों को खींच के बाहर निकालना चाह रहे थे, मुझे दर्द हो रहा था पर मजा भी लाजवाब आ रहा था। मेरा हाथ मेरी बुर में पहुँच गया। मास्टरजी मेरी चूचियों से खेल रहे थे और मैं सिसकती हुई अपनी बुर को सहला रही थी।

मास्टरजी ने फिर अपने कपड़े भी उतार दिए और बेडरूम का दरवाजा बंद कर दिया।

मैंने मास्टरजी का लंड देखा वो तना हुआ था शायद ६ इंच का होगा। उसके ऊपर की चमड़ी सुपाडे को आधा ढक रही थी और गुलाबी सुपाडा बड़ा सुन्दर लग रहा था। मैं अपनी बुर छोड़ के मास्टरजी के लंड को मुठी में भर के दबाने लगी। क्या गरम था उनका लंड। मैं तो मस्त हो गई थी। पता नहीं कैसे मेरी शर्म कहाँ गायब हो गई। मैं मास्टरजी के लंड को चूम रही थी। उसकी खुशबू मुझे बहुत मस्त लग रही थी। मैं तो अपनी जीभ भी लंड पर फिरा देती थी तो मास्टरजी के मुंह से उन्ह निकल जाती थी।

मास्टरजी ने कहा- इसे चूस के तो देख चमेली !

चमेली सुन के मुझे और मजा आया। मैंने सुपाड़े को मुंह में ले लिया। हाय क्या मस्त नरम लगा। मुँह में जाते थोड़ा कसेला सा स्वाद आया पर वासना की मस्ती में मुझे वोह भी मस्त लगा। मैं उनके लंड को पूरा मुंह में लेके अपनी थूक से उसे गीला करने लगी। उनकी लटकती गोलियों से तो मेरी उंगलियाँ हट ही नहीं रही थी। फिर मैं उनके लंड के सुपाड़े को अपने होठों में दबा के अपनी जीभ उसके छेद में रगड़ने लगी। मास्टरजी हाय हाय करते हुए झुक गए और कस कस के मेरी चूचियां मसलने लगे। उनसे खड़ा रहना नहीं हो पाया और वो बिस्तर पर पैर लटका के लेट गए। मैं घुटनों के बल उनकी जाँघों के बीच बैठ गई और एक हाथ से अपनी बुर में ऊँगली करती हुई अपनी जीभ उनके लंड पे रगड़ती रही।

अचानक मास्टरजी ने मेरे बाल पकड़ के अपने लंड पर मेरा सर दबा दिया। मैं कुछ समझ पाती, इससे पहले ही मास्टरजी के लंड से कुछ पिचकारी जैसा मेरे मुंह में आने लगा। लस लस सा नमकीन स्वाद वाला पानी मैंने पहली बार चखा था। मुझे घिन सी आई तो मैंने उस पानी को बाहर थूक दिया। गाढ़ा होने के कारण मेरे मुंह से एक धार निकल के मेरी चूचियों पर गिरी जिसे मास्टरजी ने मेरी चूचियों पे घिस दिया।

फिर मास्टरजी ने मुझे बिस्तर पे सुला दिया और मेरी स्कर्ट खोल के मुझे नंगा कर दिया। मेरी बुर पूरी तरह से भीग गई थी। मास्टरजी ने जैसे ही एक ऊँगली बुर के मुंह में रखी वो फिसल के अन्दर घुस गई। मास्टरजी के ऐसा करते ही मेरे मुंह से आह निकल गई और मैं एक बार फिर मस्त हो गई। मास्टरजी ने अपने लंड को जो थोड़ा सुस्त हो गया था, मेरी चूत के मुंह पर लगाया और मेरे दाने से रगड़ने लगे। मास्टरजी ने अपने होंठ मेरे होंठ से चिपका लिया इस तरह उनका लंड फिर से खड़ा हो गया फिर मास्टरजी मेरे ऊपर लेट गए और मुझे कस के भीच लिया।

मास्टरजी ने अपना लंड मेरी बुर के मुंह पर रखा और धीरे धीरे सरकते हुए अपना सुपाड़ा मेरी चूत में घुसा दिया। मुझे थोड़ा दर्द हुआ पर अगले ही पल एक झटके में उनका चाकू मेरी चूत को चीर चुका था। मेरी सांस गले में ही अटक गई, मैं तड़प गई। मास्टरजी ने अपने होंठ मेरे होंठ से सिल दिए और मेरी निप्पल मसलने लगे। दो चार धक्कों के बाद मुझे मजा आने लगा, मैंने अपनी गांड ऊपर उठा के मास्टरजी के लंड को पूरा ले लिया और मास्टरजी की गांड पकड़ के खींचने लगी।

मास्टरजी ने भी मौका समझ के चुदाई की स्पीड बढ़ा दी अब मेरी बुर फचक फच्च की आवाज के साथ लंड अपने अन्दर ले रही थी और मैं जन्नत की सैर कर रही थी। मास्टरजी …….। आह मास्टरजी……..। मजा आ रहा है……..। हाय क्या कर ……..दिया…….। हाय मजा…….। आह………..। मास्टर……..। पेलो ……। पेल….। पेलो……। न…….। आह……। सी सी स……..स्स्स्स…..। हाय………।

मास्टरजी अपने लंड को मेरी चूत में रख कर कमर को घुमाने लगे ….। हाय क्या मजा था……। मैं बके जा रही थी….। हाय रहने दो न इसे आज अन्दर ही…….। मत निकालो……। पेलो न पेलो न………..। हाय……

मास्टरजी को चोदने की आदत थी और वो एक खिलाडी की तरह रुक रुक के धक्के लगा रहे थे। .। पर मैं तो एक बार में ही पूरा खा जाना चाहती थी……। मैं मास्टरजी से चिपक गई और अपनी गांड हिलाते हुए लंड को लेने लगी…।

मास्टरजी ने मुझे पटक के मेरी गर्दन दबाई और बोले ….रुक रुक के कर रांड ….। कहीं मेरा निकल गया तो मेरी गोलियों को खींचने लगेगी ।

मैं कहाँ मानने वाली थी.। मैंने गांड उछालना जारी रखा….।

मस्ती सातवें आस्मां में थी……। अचानक मुझे कुछ होने लगा…..। मास्टरजी भी आँखे बंद कर के आह आह करने लगे……….

तभी झटके के साथ मैं झड़ने लगी। हाय क्या बताऊँ क्या पल था…। लंड की गर्मी, फौलाद जैसा कड़ापन। और मेरा झड़ना। तभी मास्टरजी के लंड ने भी पिचकारी छोड़ दी। मेरी बूर में डबल गर्मी..। क्या बताऊँ मजा ही आ गया…..। मास्टरजी मेरे ऊपर लुढ़क गए और मैंने भी उन्हें कस के पकड़ लिया…..। दो मिनट तक हम झड़ने का सुख लेते रहे…।

फिर मास्टरजी ने उठ कर कपड़े पहने, पर मुझसे उठा नहीं जा रहा था। मास्टरजी ने मुझे सहारा दे कर बाथरूम तक पहुँचाया और मेरी बूर की सफाई की। मुझे कपड़े पहना के वो बोले- क्यों चमेली कैसा लगा…?

मैं शरमा के मुस्कुराने लगी…..।

दर्द की हरी गोली ले लेना…। ऐसा कह के मास्टरजी चले गए।

ऐसे गए कि फिर नहीं आये। पता नहीं क्यूँ । पिताजी ने नौकर भेजा तो पता चला कि उन्होंने शहर छोड़ दिया। मैं मन मसोस के रह गई। उसके बाद मैंने कई लंड जुगाड़े पर वो स्पर्श नहीं भूल पाई।

खैर मास्टरजी न सही गुरूजी ही सही…..! क्यूँ गुरूजी…….! क्या ख्याल है…………..?

आप सब पाठकों के पत्रों और सेक्सी सामग्रियों का धन्यवाद।

मैं आप सबको चाहती हूँ।

आपकी अंतरा ……………….

Jan 092010
 

मेरे दोस्त की बहनों ने मुझे चोदा- २

प्रेषक : राजेन्द्र सिंह

मेरी पिछली आपबीती कहानी ‘मेरे दोस्त की बहनों ने मुझे चोदा’ का अगला भाग लेकर आया हूँ मैं !

आप लोगों के मेल मुझे मिले, कुछ लोगों ने बहुत प्यार दिया और कुछ लोगों ने गालियों से सत्कार किया।

तो दोस्तों मैं अपनी कहानी को आगे बढ़ाता हूँ : चौथी की हवस का शिकार बना मैं

अपने दोस्त की तीन बहनों को तो मैं चोद चुका था पर एक बच गई थी जिसका नाम सोनू था। सोनू सबसे बड़ी थी, उसकी उम्र करीब 25-26 साल की थी और उसकी कुछ महीनों बाद शादी भी होने वाली थी और वो हर वक़्त अपनी शादी की सुहागरात के बारे में सोचती रहती थी।

जब मैं तीनों लड़कियों को चोद रहा था तब वो सोनू हमें खिड़की से देख रही थी। जब मैं तीनो को पूरी तरह से चोद चुका था तब मुझे बहुत शांति मिली। पर मुझे क्या पता था कि एक और हैं चोदने के लिए, वो सबसे बड़ी थी इसलिए मैंने उसके साथ सेक्स करने के बारे में नहीं सोचा था। पर सोनू के मन में तो बस सेक्स ही घूम रहा था। वो कमरे में आई जिसमें हम चारों बैठे थे, मेरा हाथ पकड़ा, मैं डर गया। उसने मेरा हाथ पकड़ा और एक दूसरे कमरे में ले गई, कमरे की कुण्डी लगा दी। उसकी आँखों में जैसे खून उतर आया था, उसे देख कर मेरी गांड और फट गई। फिर सोनू ने मुझे बेड पर धक्का दे कर लिटा दिया उसकी तीनों बहनें खिड़की से सब कुछ देख रही थी। सोनू ने सीडी प्लेयर पर ‘आशिक बनाया आपने’ का गाना लगा दिया और वो मेरी तरफ देखने लगी। मैंने अपनी आंखे नीचे कर ली क्योंकि वो मुझसे उम्र में बहुत बड़ी थी। अब वो धीरे धीरे मेरी तरफ बढ़ने लगी।

मैं अपने मन में यही सोच रहा था कि यार जो काम मुझे करना चाहिए था, वो तो यह कर कही है, और डरना इसे चाहिए था, तो डर मैं रहा हूँ। फिर मैंने भी यह फैसला कर लिया कि सोनू जो करना चाहती है, करने देता हूँ। मैं भी तो देखूँ कि एक लड़की में कितना सेक्स होता है। बस फिर क्या था, मैं चुपचाप लेटा रहा, सोनू धीरे धीरे मेरे पैरों को चूमती चूमती ऊपर की ओर आने लगी। पर मुझे कुछ भी नहीं हो रहा था क्योंकि मैं पहले ही तीन लडकियों को अच्छी तरह चोद चुका था।

वो धीरे धीरे मेरे सीने पर आ गई और मेरे सीने को चूमने लगी, फिर गले को चूमने लगी। कुछ देर में सोनू मेरे होंटों को आम की तरह चूसने लगी। दो तीन बार तो सोनू ने मेरे होंटों को काटा भी, पर फिर भी मैं लेटा ही रहा। बहुत देर तक सोनू मेरे होंटों को चूसती रही और एक ही गाना बार बार चलता रहा। सोनू अपना एक हाथ धीरे धीरे नीचे की ओर ले गई और मेरी पैंट के ऊपर से ही मेरा लंड पकड़ लिया। लंड तो गहरी नींद में सो रहा था पर फिर भी सोनू मेरे लंड को नींद से जगाने में लगी हुई थी। सोनू ने मेरी पैंट की जिप खोली और मेरा लंड हाथ में ले लिया।

उसके गरम हाथों ने जैसे ही मेरा लंड पकड़ा, मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई और मैंने सोनू को जोर से अपनी बाहों में भर लिया, इतनी जोर से पकड़ा कि सोनू चिल्ला पड़ी। खिड़की से सोनू की तीनों बहनें सब देख रही थी। मैंने सोनू से बोला- सोनू जी, पहले आप यह खिड़की बंद कर दो। नहीं तो तुम चारों बहनें मुझे मेरे घर नहीं जाने दोगी और मेरे अन्दर इतनी ताकत नहीं है कि एक के बाद एक की चुदाई कर सकूँ !

सोनू ने खिड़की बंद कर दी और फिर से वो मेरे ऊपर आ गई। अब सोनू धीरे धीरे ऊपर से नीचे की ओर चूमते हुए आने लगी और मेरे ठंडे लंड को अपने मुँह की गर्मी देने लगी। कुछ देर तक सोनू मेरे लंड को चूसती रही। सोनू ने मेरे लंड को चूसते-चूसते खड़ा कर दिया। फिर क्या था- लोहा गरम था, बस चोट मारना बाकी था। मैंने सोनू को कुतिया की तरह झुकने को कहा पर उसके मन में तो कुछ और ही चल रहा था।

सोनू बोली- अभी रूको मेरी जान ! जल्दी क्या है, अभी तो खेल बहुत देर तक चलेगा ! अभी से चोक्के-छक्के लगाओगे तो जल्दी आउट हो जाओगे !

बस इतना बोला और सोनू ने अपनी चूत मेरे मुँह पर सटा दी और बोली- मैं ही सब करुँगी या तू भी कुछ करेगा ? चाट मेरी चूत को !

और हम 69 की पोजीशन में आ गए। सोनू मेरा लंड चूस रही थी और मैं उसकी चूत ! बहुत देर तक यही चुसमचासी होती रही।

मैं उसकी चूत चूसते-चूसते थक गया था तो मैंने अपनी दो उंगलियाँ उसकी चूत में डाल दी। वो शायद पहले भी किसी से चुद चुकी थी, दो उंगलियों से साली को कुछ भी नहीं हुआ पर फिर भी मैं दो उंगलियाँ अन्दर बाहर करता रहा। धीरे धीरे दो से तीन उंगलियाँ अन्दर कर दी। जैसे ही मैंने तीन उंगलियाँ अन्दर की, सोनू तो उछल गई और बोली- हाय, यह क्या किया तूने ! कितना मज़ा आ रहा था चूसने और चुसवाने में ! अब तूने मेरी चूत में खुजली कर दी ! अब तो बस तू मेरी चूत फाड़ ही डाल ! अब नहीं रुका जायेगा ! अब तू मुझे कुतिया बना या घोड़ी, बस चोद दे मुझे तू !

फिर क्या था, सोनू को मैंने बेड पर पीठ के बल लिटा दिया, उसकी दोनों टाँगें अपने कंधे पर रखी और अपने एक हाथ से अपना लंड पकड़ कर सोनू की चूत के मुँह पर रगड़ने लगा। लंड की रगड़ से सोनू और पागल हो गई और मुझे गाली दे कर बोली- कुत्ते ! अब अपने लंड को चूत में तो डाल !

पर मैं कहाँ सुनने वाला था, मैं तो बस उसकी चूत पर अपना लंड रगड़ता रहा, बहुत देर तक सोनू मुझे गन्दी गन्दी गलिया देती रही और मैं रगड़ता रहा। अब सोनू की चूत से चिकना सा पानी निकलने लगा, सोनू बोली- कुत्ते, डाल दे चूत में ! मैं झड़ने वाली हूँ !

मैंने सोनू के चिकने पानी को अपने लंड पर लगाया और जोर का धक्का मारा, सोनू एक दम से चीख पड़ी- आआआआआआआआआआअ कुत्ते मार डाला !

मैंने सोनू की चूत में जैसे ही अपना लंड डाला वो झड़ गई, मेरा पूरा लंड उसकी चूत के पानी से नहा गया और वो शांत पड़ गई। पर मैं नहीं झड़ा था, मैं सोनू की चूत चोदता रहा पर सोनू की चूत मारने में मज़ा नहीं आ रहा था क्योंकि वो पहले भी किसी से चुद चुकी थी। फिर मैंने सोनू से बोला- सोनू, तेरी चूत मारने में मज़ा नहीं आ रहा ! मैं तो तेरी गांड मारुँगा !

पर सोनू ने मना कर दिया पर मैं भी बहुत जिद्दी था, मैंने सोनू की चूत एक कपड़े से साफ की और चूत के दाने को अपनी जीभ से सहलाने लगा। धीरे धीरे सोनू को फिर से जोश चढ़ने लगा। सोनू कुछ ही देर में फिर से पागलों की तरह मेरे सर को पकड़ के अपनी चूत पर दबाने लगी। मैं समझ गया कि सोनू अब पूरी तरह जोश में है।

सोनू मुझसे बोली- फाड़ दे मेरी चूत को !

पर मुझे तो गांड मारनी थी, बस मैं खड़ा हो गया और अपने घर जाने लगा। सोनू सेक्स में पूरी तरह तड़प रही थी। सोनू बोली- कहाँ जा रहे हो तुम?

मैंने बोला- अपने घर जा रहा हूँ !

फिर सोनू बोली- मुझे तड़पता हुआ छोड़ कर क्यों जा रहे हो ?

मैंने बोला- तेरी चूत मारने में मुझे बिल्कुल भी मज़ा नहीं आ रहा है, तेरी चूत मारने से तो अच्छा है कि मैं मुठ ही मार लूँ !

सोनू तड़पती हुई बोली- प्लीज़ ! राहुल, मुझे ऐसे छोड़ कर मत जाओ !

मैंने बोला- मैं एक ही शर्त पर तुझे चोदूँगा !

वो बोली- क्या?

मैंने कहा- मुझे तेरी गांड मारनी है, अगर तुझे गांड मरवानी हैं तो बोल, नहीं तो मैं चला !

सोनू बोली- नहीं राहुल ! गांड मरवाने से मुझे बहुत दर्द होता है, मैं वो दर्द सहेन नहीं कर पाती !

मैंने उसे भरोसा दिलाया कि दर्द नहीं होने दूंगा। फिर सोनू अपनी गांड मरवाने के लिए तैयार हो गई। मैंने पास पड़ी बोरोप्लस की क्रीम अपनी बड़ी उंगली से सोनू की गांड पर लगाई और वो उंगली सोनू की गांड में डाल दी सोनू ने थोड़ी सी सिसकी भरी, मैं उंगली को सोनू की गांड में अन्दर बाहर करने लगा और जैसे जैसे मैं अपनी उंगली की स्पीड तेज करता, वैसे वैसे सोनू की सिसकियाँ भी तेज हो जाती।

सोनू बस यही बोल रही थी- नहीं राहुल ! नहीं राहुल ! आआआआआआईईईईईईईऊऊऊऊऊ !

उसकी चीखें धीरे धीरे कामुक स्वर में बदलती जा रही थी और कसी गांड धीरे धीरे नरम होती जा रही थी। मैंने भी अपनी एक उंगली की जगह दो उंगलियाँ सोनू की गांड में डाल दी और फिर अब सोनू की गांड मेरे लंड के लिए तैयार थी।मैंने एक बार फिर से बोरोप्लस क्रीम सोनू की गांड पर लगाई और अपने लंड को धीरे धीरे सोनू की गांड में डालना शुरू किया। अभी बस अग्र भाग ही अन्दर गया था कि सोनू चिल्ला पड़ी। मैंने सोनू को थोड़ा प्यार किया और उसे घुटनों और हाथों के बल झुका दिया। उसकी टाँगों और जांघों के बीच में दो तकिये लगा दिये जिससे सोनू की गांड ठीक मेरे लंड पे आ गई। अब उसकी गांड भी सही तरह से खुल गई और मेरे लंड के निशाने पर भी आ गई। मैंने एक बार फिर से सोनू की गांड में अपना लंड डालना शुरू किया। धीरे धीरे मेरा लंड सोनू की गांड की गहराई में समा गया। पहले तो मैंने धीरे धीरे अपना लंड सोनू की गांड में अन्दर-बाहर किया और फिर धीरे धीरे मेरे लंड की स्पीड तेज होने लगी। सोनू की सिसकियाँ चीखों में बदलने लगी आआआआआईईईईईईइ माम्म्म्मम्म मैं मार गईईईईईईई राहुल नहींईईईईईइ !

पर मैं तो अपने ही जोश में था, मैंने उसकी एक नहीं सुनी और जोर जोर के धक्के मारने लगा। धीरे धीरे सोनू का दर्द भी कम होने लगा और उसे मज़ा आने लगा। कुछ देर में सोनू खुद ही अपनी गांड उठा उठा कर मेरा पूरा का पूरा लंड अपनी गांड में ले जाती और बोली- और जोर से ! मज़ा आ रहा हैं राहुल ! और चोदो मुझे !

पर अब मैं कुछ ही देर का मेहमान था, 5-6 धक्कों के साथ मैं उसकी गांड में ही झड़ गया पर सोनू अभी भी नहीं झड़ी थी। मैंने उसकी चूत के दाने को चूसना शुरू कर दिया। कुछ ही मिनटों में सोनू भी झड़ गई और हम दोनों एक दूसरे से चिपक कर कुछ देर तक लेटे रहे और किस करते रहे।

फिर मैं अपने घर जा कर सो गया।

उस दिन के बाद मैं उनके पास बहुत कम जाने लगा पर जब भी जाता तो बस अपनी गर्लफ्रेंड रीतू को ही चोदता था और किसी को नहीं !

फिर कुछ ही महीनों बाद दो लड़कियों की एक साथ शादी हो गई और कुछ साल बाद दो और लड़कियों की शादी हो गई।

मेरा यह सफ़र यहीं खत्म होता है, मेरी अगली कहानी में आप पढ़ेंगे कि किस तरह मैंने एक लड़के को चोदा जिसे चुदने का बहुत शौक था।

दोस्तो, मेरी कहानी आप को कैसे लगी, मुझे जरूर बतायें ! आपके मेल से हम लोगों का होंसला बढ़ता है।

धन्यवाद !

Jan 092010
 

आंटी गुलबदन और सेक्स (प्रेम) के सात सबक-5

प्रेम गुरु की कलम से

7. गुदा-मैथुन (गांडबाज़ी)

मैंने अपने साथ पढ़ने वाले लड़कों से सुना भी था और मस्तराम की कहानियों में भी गांडबाजी के बारे में पढ़ा था। पर मुझे विश्वास ही नहीं होता था कि ऐसा सचमुच में होता होगा। आंटी ने जब सातवें सबक के बारे में बताया कि यह गुदा-मैथुन के बारे में होगा तो मुझे बड़ी हैरानी हुई लेकिन बाद में तो मैं इस ख़याल से रोमांचित ही हो उठा कि मुझे वो इसका मज़ा भी देंगी।

आंटी ने बताया कि ज्यादातर औरतें इस क्रिया बड़ी अनैतिक, कष्टकारक और गन्दा समझती हैं। लेकिन अगर सही तरीके से गुदा-मैथुन किया जाए तो यह बहुत ही आनंददायक होता है। एक सर्वे के अनुसार पाश्चात्य देशों में 70 % और हमारे यहाँ 15 % लोगों ने कभी ना कभी गुदा-मैथुन का आनंद जरुर लिया है। पुरुष और महिला के बीच गुदा-मैथुन द्वारा आनंद की प्राप्ति सामान्य घटना है। इंग्लैंड जैसे कई देशों में तो इसे कानूनी मान्यता भी है। पर अभी हमारे देश में इसके प्रति नजरिया उतना खुला नहीं है। लोग अभी भी इसे गन्दा समझते हैं। पर आजकल के युवा कामुक फिल्मों में यह सब देख कर इसके प्रति आकर्षित हो रहे हैं।

योनि के आस पास बहुत सी संवेदनशील नसें होती है और कुछ गुदा के अन्दर भी होती हैं। इस लिए गुदा-मैथुन में पुरुषों के साथ साथ स्त्रियों को भी मज़ा आता है। और यही कारण है कि दुनिया में इतने लोग समलिंगी होते हैं और ख़ुशी ख़ुशी गांड मरवाते हैं। महिलाओं को भी इसमें बड़ा मज़ा आता है। कुछ शौक के लिए मरवाती हैं और कुछ अनुभव के लिए। आजकल की आधुनिक औरतें कुछ नया करना चाहती हैं इसलिए उन में लंड चूसने और गांड मरवाने की ललक कुछ ज्यादा होती है। अगर वो बहुत आधुनिक और चुलबुली है तो निश्चित ही उसे इसमें बड़ा मज़ा आएगा। वैसे समय के साथ योनि में ढीलापन आ जाता है और लंड के घर्षण से ज्यादा मज़ा नहीं आता। पर गांड महारानी को तो कितना भी बजा लिया जाए वह काफी समय तक कसी हुई रहती है और उसकी लज्जत बरकरार रहती है क्योंकि उसमें लचीलापन नहीं होता। इसलिए गुदा-मैथुन में अधिक आनंद की अनुभूति होती है।

एक और कारण है। एक ही तरह का सेक्स करते हुए पति पत्नी दोनों ही उकता जाते हैं और कोई नई क्रिया करना चाहते हैं। गुदा-मैथुन से ज्यादा रोमांचित करने वाली कोई दूसरी क्रिया हो ही नहीं सकती। पर इसे नियमित तौर पर ना करके किसी विशेष अवसर के लिए रखना चाहिए जैसे कि होली, दिवाली, नववर्ष, जन्मदिन, विवाह की सालगिरह या वो दिन जब आप दोनों सबसे पहले मिले थे। अपने पति को वश में रखने का सबसे अच्छा साधन यही है। कई बार पत्नियां अपने पति को गुदा-मैथुन के लिए मना कर देती हैं तो वो उसे दूसरी जगह तलाशने लग जाता है। अपने पति को भटकने से बचाने के लिए और उसका पूर्ण प्रेम पाने के लिए कभी कभी गांड मरवा लेने में कोई बुराई नहीं होती।

प्रेम आश्रम वाले गुरुजी कहते हैं कि औरत को भगवान् ने तीन छेद दिए हैं और तीनों का ही आनंद लेना चाहिए। इस धरती पर केवल मानव ही ऐसा प्राणी है जो गुदा-मैथुन कर सकता है। जीवन में अधिक नहीं तो एक दो बार तो इसका अनुभव करना ही चाहिए। सुखी दाम्पत्य का आधार ही सेक्स होता है पर अपने प्रेम को स्थिर रखने के लिए गुदा-मैथुन भी कभी कभार कर लेना चाहिए। इस से पुरुष को लगता है कि उसने अपनी प्रियतमा को पूर्ण रूप से पा लिया है और स्त्री को लगता है कि उसने अपने प्रियतम को सम्पूर्ण समर्पण कर दिया है।

खैर मैं 4 दिनों के सूखे के बाद आज रात को ठीक 9.00 बजे आंटी के घर पहुँच गया। मुझे उस दिन वाली बात याद थी इसलिए आज मैंने सुबह एक मार मुट्ठ मार ली थी। मैंने पैंट और शर्ट डाल रखी थी पर अन्दर चड्डी जानकर ही नहीं पहनी थी। आंटी ने पतला पजामा और टॉप पहन रखा था। उसके नितम्बों पर कसा पजामा उसकी चूत और नितम्बों का भूगोल साफ़ नज़र आ रहा था लगता था उसने भी ब्रा और पैंटी नहीं पहनी है।

मैंने दौड़ कर उसे बाहों में भर लिया और उसे चूमने लगा तो आंटी बोली,”ओह … चंदू फिर जल्दबाजी ?”

“मेरी चांदनी मैंने ये 4 दिन कैसे बिताये हैं मैं ही जानता हूँ !” मैंने उसके नितम्बों पर अपने हाथ सहलाते हुए जोर से दबा दिए।

“ओह्हो ?” उसने मेरी नाक पकड़ते हुए कहा।

एक दूसरे की बाहों में जकड़े हम दोनों बेडरूम में आ गए। पलंग पर आज सफ़ेद चादर बिछी थी। साइड टेबल पर वैसलीन, बोरोप्लस क्रीम, नारियल और सरसों के तेल की 2-3 शीशियाँ, एक कोहेनूर निरोध (कंडोम) का पैकेट, धुले हुए 3-4 रुमाल और बादाम-केशर मिला गर्म दूध का थर्मोस रखा था। मुझे इस बात की बड़ी हैरानी थी कि एक रबर की लंड जैसी चीज भी टेबल पर पड़ी है। पता नहीं आंटी ने इसे क्यों रखा था। इससे पहले कि मैं कुछ पूछता, आंटी बोली,”हाँ तो आज का सबक शुरू करते हैं। आज का सबक है गधापचीसी। इसे बैक-डोर एंट्री भी कहते हैं और जन्नत का दूसरा दरवाज़ा भी। तुम्हें हैरानी हो रही होगी ना ?”

मैं जानता तो था पर मैंने ना तो हाँ कहा और ना ही ना कहा। बस उसे देखता ही रह गया। मैं तो बस किसी तरह यह चाह रहा था कि आंटी को उल्टा कर के बस अपने लंड को उनकी कसी हुई गुलाबी गांड में डाल दूं।

“देखो चंदू सामान्यतया लडकियां पहली बार गांड मरवाने से बहुत डरती और बिदकती हैं। पता नहीं क्यों ? पर यह तो बड़ा ही फायदेमंद होता है। इसमें ना तो कोई गर्भ धारण का खतरा होता है और ना ही शादी से पहले अपने कौमार्य को खोने का डर। शादीशुदा औरतों के लिए परिवार नियोजन का अति उत्तम तरीका है। कुंवारी लड़कियों के लिए यह गर्भ से बचने का एक विश्वसनीय और आनंद दायक तरीका है। माहवारी के दौरान अपने प्रेमी को संतुष्ट करने का इस से बेहतर तरीका तो कुछ हो ही नहीं सकता। सोचो अपने प्रेमी को कितना अच्छा लगता है जब वो पहली बार अपनी प्रेमिका की अनचुदी और कोरी गांड में अपना लंड डालता है।”

मेरा प्यारे लाल तो यह सुनते ही 120 डिग्री पर खड़ा हो गया था और पैंट में उधम मचाने लगा था। मैं पलंग की टेक लगा कर बैठा था और आंटी मेरी गोद में लेटी सी थी। मैं एक हाथ से उसके उरोजों को सहला रहा था और दूसरे हाथ से उसकी चूत के ऊपर हाथ फिरा रहा था ताकी वो जल्दी से गर्म हो जाए और मैं जन्नत के उस दूसरे दरवाज़े का मज़ा लूट सकूं।

आंटी ने कहना जारी रखा,”कहने में बहुत आसान लगता है पर वास्तव में गांड मारना और मरवाना इतना आसान नहीं होता। कई बार ब्लू फिल्मों में दिखाया जाता है कि 8-9 इंच लम्बा और 2-3 इंच मोटा लंड एक ही झटके में लड़की की गांड में प्रवेश कर जाता है और दोनों को ही बहुत मज़ा लेते दिखाई या जाता है। पर वास्तव में इनके पीछे कैमरे की तकनीक और फिल्मांकन होता है। असल जिन्दगी में गांड मारना इतना आसान नहीं होता इसके लिए पूरी तैयारी करनी पड़ती है और बहुत सी बातों का ध्यान रखना पड़ता है।”

मुझे बड़ी हैरानी हो रही थी भला गांड मारने में क्या ध्यान रखना है। घोड़ी बनाओ और पीछे से ठोक दो ? पर मैंने पूछा “किन बातों का ?”

“सबसे जरुरी बात होती है लड़की को इस के लिए राज़ी करना ?”

“ओह …”

“हाँ सबसे मुश्किल काम यही होता है। इस लिए सबसे पहले उसे इसके लिए मानसिक रूप से तैयार करना जरुरी होता है। भगवान् या कुदरत ने गांड को सम्भोग के लिए नहीं बनाया है। इसकी बनावट चूत से अलग होती है। इसमें आदमी का लंड उसकी मर्ज़ी के बिना प्रवेश नहीं कर सकता। इसके अन्दर बनी मांसपेशियाँ और छल्ला वो अपनी मर्ज़ी से ढीला और कस सकती हैं। ज्यादातर लडकियां और औरतें इसे गन्दा और कष्टकारक समझती हैं। इसलिए उन्हें विश्वास दिलाना जरुरी होता है कि प्रेम में कुछ भी गन्दा और बुरा नहीं होता। उसका मूड बनाने के लिए कोई ब्लू फिल्म भी देखी जा सकती है। उसे गुदा-मैथुन को लेकर अपनी कल्पनाओं के बारे में भी बताओ। उसे बताओ कि उसके सारे अंग बहुत खूबसूरत हैं और नितम्ब तो बस क़यामत ही हैं। उसकी मटकती गांड के तो तुम दीवाना ही हो। अगर एक बार वो उसका मज़ा ले लेने देगी तो तुम जिंदगी भर उसके गुलाम बन जाओगे। उसे भी गांड मरवाने में बड़ा मज़ा आएगा और यह दर्द रहित, रोमांचकारी, उत्तेजक और कल्पना से परिपूर्ण तीव्रता की अनुभूति देगा। और अगर जरा भी कष्ट हुआ और अच्छा नहीं लगा तो तुम उससे आगे कुछ नहीं करोगे।

एक बात ख़ासतौर पर याद रखनी चाहिए कि इसके लिए कभी भी जोर जबरदस्ती नहीं करनी चाइये। कम से कम अपनी नव विवाहिता पत्नी से तो कभी नहीं। कम से कम एक साल बाद ही इसके लिए कहना चाहिए।”

“हूँ ….”

“उसके मानसिक रूप से तैयार होने के बाद भी कोई जल्दबाज़ी नहीं। उसे शारीरिक रूप से भी तो तैयार करना होता है ना। अच्छा तो यह रहता है कि उसे इतना प्यार करो कि वो खुद ही तुम्हारा लंड पकड़ कर अपनी गांड में डालने को आतुर हो जाए। गुदा-मैथुन से पूर्व एक बार योनि सम्भोग कर लिया जाए अच्छा रहता है। इस से वो पूर्ण रूप से उत्तेजित हो जाती है। ज्यादातर महिलायें तब उत्तेजना महसूस करती हैं जब पुरुष का लिंग उनकी योनि में घर्षण कर रहा होता है। इस दौरान अगर उसकी गांड के छेद को प्यार से सहलाया जाए तो उसकी गांड की नसें भी ढीली होने लगेंगी और छल्ला भी खुलने बंद होने लगेगा। साथ साथ उसके दूसरे काम अंगों को भी सहलाओ, चूमो और चाटो !”

“और जब लड़की इसके लिए तैयार हो जाए तो सबसे पहले अपने सारे अंगों की ठीक से सफाई कर लेनी चाहिए। पुरुष को अपना लंड साबुन और डिटोल से धो लेना चाहए और थोड़ी सी सुगन्धित क्रीम लगा लेनी चाहिए। मुंह और दांतों की सफाई भी जरुरी है। नाखून और जनन अंगों के बाल कटे हों। लड़कियों को भी अपनी योनि, गुदा नितम्ब, उरोजों और अपने मुंह को साफ़ कर लेना चाहिए। गुदा की सफाई विशेष रूप से करनी चाहिए क्यों कि इसके अन्दर बहुत से बेक्टीरिया होते हैं जो कई बीमारियाँ फैला सकते हैं। दैनिक क्रिया से निपट कर एक अंगुली में सरसों का तेल लगा कर अन्दर डाल कर साफ़ कर लेनी चाहिए। गुदा-मैथुन रात को ही करना चाहिए। और जिस रात गुदा-मैथुन करना हो दिन में 3-4 बार गुदा के अन्दर कोई एंटीसेफ्टिक क्रीम लगा लेनी चाहिए। कोई सुगन्धित तेल या क्रीम अपने गुप्तांगों और शरीर पर लगा लेनी चाहिए। पास में सुगन्धित तेल, क्रीम, छोटे तौलिये और कृत्रिम लिंग (रबर का) रख लेना चाहिए।”

“ओह …” मेरे मुंह से तो बस इतना ही निकला।

“चलो अब शुरू करें ?”

“ओह… हाँ…”

मैंने नीचे होकर उसके होंठ चूम लिए। उसने भी मुझे बाहों में कस कर पकड़ लिया। और बिस्तर पर लुढ़क गए। आंटी चित्त लेट गई। मेरा एक पैर उसकी जाँघों के बीच था लगभग आधा शरीर उसके ऊपर था। उसकी बाहों के घेरे ने मुझे जकड़ रखा था। मैंने उसके गालों पर होंठों पर गले और माथे पर चुम्बनों की झड़ी लगा दी। साथ साथ कभी उसके उरोज मसलता कभी अपना हाथ पजामे के ऊपर से ही उसकी मुनिया को सहला और दबा देता। उसकी मुनिया तो पहले से ही गीली हो रही थी।

अब हमने अपने कपड़े उतार दिए और फिर एक दूसरे को बाहों में भर लिया। मैं उसके ऊपर लेटा था। पहले मैंने उसके उरोजों को चूसा और फिर उसके पेट नाभि, पेडू को चूमते चाटते हुए नीचे तक आ गया। एक मीठी और मादक सुगंध मेरे नथुनों में भर गई। मैंने गप्प से उसकी मुनिया को मुंह में भर लिया। आंटी ने अपने पैर चौड़े कर दिया। मोटी मोटी फांकें तो आज फूल कर गुलाबी सी हो रही थी। मदनमणि तो किसमिस के फूले दाने जैसी हो रही थी। मैं अपनी जीभ से उसे चुभलाने लगा। उसकी तो सीत्कार ही निकल गई। कभी उसकी तितली जैसी पतली पतली अंदरुनी फांकें चूसता कभी उस दाने को दांतों से दबाता। साथ साथ उसके उरोजों को भी दबा और सहला देता।

आंटी ने अपने घुटने मोड़ कर ऊपर उठा लिए। मैंने एक तकिया उसके नितम्बों के नीचे लगा दिया। आंटी ने अपनी जांघें थोड़ी सी चौड़ी कर दी। अब तो उसकी चूत और गांड दोनों के छेद मेरी आँखों के सामने थे। गांड का बादामी रंग का छोटा सा छेद तो कभी खुलता कभी बंद होता ऐसे लग रहा था जैसे मुंबई की मरीन ड्राइव पर कोई नियोन साइन रात की रोशनी में चमक रहा हो। मैंने एक चुम्बन उस पर ले लिया और जैसे ही उस पर अपनी जीभ फिराई तो आंटी की तो किलकारी ही निकल गई। उसकी चूत तो पहले से ही गीली हुई थी। फिर मैंने स्टूल पर पड़ी वैसलीन की डब्बी उठाई और अपनी अंगुली पर क्रीम लगाई और अंगुली के पोर पर थोड़ी सी क्रीम लगा कर उसके खुलते बंद होते गांड के छेद पर लगा दी। दो तीन बार हल्का सा दबाव बनाया तो मुझे लगा आंटी ने बाहर की ओर जोर लगाया है। उसकी गांड का छेद तो ऐसे खुलने लगा जैसे कोई कमसिन कच्ची कलि खिल रही हो। मेरा एक पोर उसकी गांड के छेद में चला गया। आह… कितना कसाव था। इतना कसाव महसूस कर के मैं तो रोमांच से भर उठा। बाद में मुझे लगा कि जब अंगुली में ही इतना कसाव महसूस हो रहा है तो फिर भला मेरा इतना मोटा लंड इस छोटे से छेद में कैसे जा पायेगा ?

मैंने आंटी से पूछा “चांदनी, एक बात पूछूं ?”

“आह … हूँ । ?”

“क्या तुमने पहले भी कभी गांड मरवाई है ?”

“तुम क्यों पूछ रहे हो ?”

“वैसे ही ?”

“मैं जानती हूँ तुम शायद यह सोच रहे होगे कि इतना मोटा लंड इस छोटे से छेद में कैसे जाएगा ?”

“हूँ …?”

“तुम गांड रानी की महिमा नहीं जानते। हालांकि इस में चूत की तरह कोई चिकनाई नहीं होती पर अगर इसे ढीला छोड़ दिया जाए और अन्दर ठीक से क्रीम लगा कर तर कर लिया जाए तो इसे मोटा लंड अन्दर लेने में भी कोई दिक्कत नहीं होगी। पर तुम जल्दबाज़ी करोगे तो सब गुड़ गोबर हो जाएगा !”

“क्या मतलब?”

मेरे पति ने एक दो बार मेरी गांड मारने की कोशिश की थी पर वो अनाड़ी था। ना तो मुझे तैयार किया और ना अपने आप को। जैसे ही उसने अपना लंड मेरे नितम्बों के बीच डाला अति उत्तेजना में उसकी पिचकारी फूट गई और वो कुछ नहीं कर पाया ? पर तुम चिंता मत करो मैं जैसे समझाऊँ वैसे करते जाओ। सब से पहले इसे क्रीम लगा कर पहले रवां करो ”
“ओके …”

अब मैंने बोरोप्लस की ट्यूब का ढक्कन खोल कर उसकी टिप को गांड के छेद पर लगा दिया। ट्यूब का मुंह थोड़ा सा गांड के छेद में चला गया। अब मैंने उसे जोर से पिचका दिया। लगभग ट्यूब की आधी क्रीम उसकी गांड के अन्दर चली गई। आंटी थोड़ा सा कसमसाई। लगता था उसे गुदगुदी और थोड़ी सी ठंडी महसूस हुई होगी। मैंने अपनी अंगुली धीरे धीरे अन्दर खिसका दी। अब तो मेरी अंगुली पूरी की पूरी अन्दर बाहर होने लगी। आह… मेरी अंगुली के साथ उसका छल्ला भी अन्दर बाहर होने लगा। अब मुझे लगने लगा था की छेद कुछ नर्म पड़ गया है और छल्ला भी ढीला हो गया है। मैंने फिर से उसकी चूत को चूसना चालू कर दिया। आंटी के कहे अनुसार मैंने यह ध्यान जरूर रखा था कि गांड वाली अंगुली गलती से उसकी चूत के छेद में ना डालूं।

आंटी की मीठी सीत्कार निकलने लगी थी। आंटी ने अब कहा “उस प्यारे लाल को भी उठाओ ना ?”

“हाँ वो तो कब का तैयार है जी !” मैंने अपने लंड को हाथ में लेकर हिला दिया।

“अरे बुद्धू मैं टेबल पर पड़े प्यारे लाल की बात कर रही हूँ !”

“ओह …”

अब मुझे इस प्यारे लाल की उपयोगिता समझ आई थी। मैंने उसे जल्दी से उठाया और उस पर वैसलीन और क्रीम लगा कर धीरे से उसके छेद पर लगाया। धीरे धीरे उसे अन्दर सरकाया। आंटी ने बताया था कि धक्का नहीं लगाना बस थोड़ा सा दबाव बनाना है। थोड़ी देर बाद वो अपने आप अन्दर सरकना शुरू हो जाएगा।

धीरे धीरे उसकी गांड का छेद चौड़ा होने लगा और प्यारे लाल जी अन्दर जाने लगे। गांड का छेद तो खुलता ही चला गया और प्यारे लाल 3 इंच तक अन्दर चला गया। आंटी ने बताया था कि अगर एक बार सुपाड़ा अन्दर चला गया तो बस फिर समझो किला फतह हो गया है। मैं 2-3 मिनट रुक गया। आंटी आँखें बंद किये बिना कोई हरकत किये चुप लेटी रही। अब मैंने धीरे से प्यारे लाल को पहले तो थोड़ा सा बाहर निकला और फिर अन्दर कर दिया। अब तो वह आराम से अन्दर बाहर होने लगा था। मैंने उसे थोड़ा सा और अन्दर डाला। इस बार वो 5-6 इंच अन्दर चला गया। मेरा लंड भी तो लगभग इतना ही बड़ा था। अब तो प्यारे लाल जी महाराज आराम से अन्दर बाहर होने लगे थे।

3-4 मिनट ऐसा करने के बाद मुझे लगा कि अब तो उसका छेद बिलकुल रवां हो गया है। मेरा लंड तो प्री-कम छोड़ छोड़ कर पागल ही हो रहा था। वो तो झटके पर झटके मार रहा था। मैंने एक बार फिर से उसकी मुनिया को चूम लिया। थोड़ी देर उसकी मुनिया और मदनमणि हो चूसा और दबाया। उसकी मुनिया तो कामरस से लबालब भरी थी जैसे। आंटी ने अपने पैर अब नीचे कर के फैला दिए और मुझे ऊपर खींच लिया। मैंने उसके होंठों को चूम लिया।

“ओह … मेरे चंदू … आज तो तुमने मुझे मस्त ही कर दिया !” आंटी उठ खड़ी हुई। “क्या अब तुम इस आनंद को भोगने के लिए तैयार हो ?”

“मैं तो कब से इंतज़ार कर रहा हूँ ?”

“ओह्हो … क्या बात है ? हाईई।.. मैं मर जावां बिस्कुट खा के ?” आंटी कभी कभी पंजाबी भी बोल लेती थी।

“देखो चंदू साधारण सम्भोग तो किसी भी आसन में किया जा सकता है पर गुदा-मैथुन 3-4 आसनों में ही किया जाता है। मैं तुम्हें समझाती हूँ। वैसे तुम्हें कौन सा आसन पसंद है ?”

“वो… वो… मुझे तो डॉगी वाला या घोड़ी वाला ही पता है या फिर पेट के बल लेटा कर …?”

“अरे नहीं… चलो मैं समझाती हूँ !” बताना शुरू किया।

पहली बार में कभी भी घोड़ी या डॉगी वाली मुद्रा में गुदा-मैथुन नहीं करना चाहिए। पहली बार सही आसन का चुनाव बहुत मायने रखता है। थोड़ी सी असावधानी या गलती से सारा मज़ा किरकिरा हो सकता है और दोनों को ही मज़े के स्थान पर कष्ट होता है।

देखो सब से उत्तम तो एक आसन तो है जिस में लड़की पेट के बल लेट जाती है और पेट के नीचे दो तकिये लगा कर अपने नितम्ब ऊपर उठा देती है। पुरुष उसकी जाँघों के बीच एक तकिये पर अपने नितम्ब रख कर बैठ जाता है और अपना लिंग उसकी गुदा में डालता है। इस में लड़की अपने दोनों हाथों से अपने नितम्ब चौड़े कर लेती है जिस से उसके पुरुष साथी को सहायता मिल जाती है और वो एक हाथ से उसकी कमर या नितम्ब पकड़ कर दूसरे हाथ से अपना लिंग उसकी गुदा में आराम से डाल सकता है। लड़की पर उसका भार भी नहीं पड़ता।

एक और आसन है जिसमें लड़की पेट के बल अधलेटी सी रहती है। एक घुटना और जांघ मोड़ कर ऊपर कर लेती है। पुरुष उसकी एक जांघ पर बैठ कर अपना लिंग उसकी गुदा में डाल सकता है। इस आसन का एक लाभ यह है कि इसमें दोनों ही जल्दी नहीं थकते और धक्के लगाने में भी आसानी होती है। जब लिंग गुदा में अच्छी तरह समायोजित हो जाए तो अपनी मर्ज़ी से लिंग को अन्दर बाहर किया जा सकता है। गांड के अन्दर प्रवेश करते लंड को देखना और उस छल्ले का लाल और गुलाबी रंग देख कर तो आदमी मस्त ही हो जाता है। वह उसके स्तन भी दबा सकता है और नितम्बों पर हाथ भी फिरा सकता है। सबसे बड़ी बात है उसकी चूत में भी साथ साथ अंगुली की जा सकती है। इसका सबसे बड़ा फायदा तो यह है कि धक्का मारते या दबाव बनाते समय लड़की आगे नहीं सरक सकती इसलिए लंड डालने में आसानी होती है।

एक और आसन है जिसे आमतौर पर सभी लड़कियां पसंद करती है। वह है पुरुष साथी नीचे पीठ के बल लेट जाता है और लड़की अपने दोनों पैर उसके कूल्हों के दोनों ओर करके उकडू बैठ जाती है। उसका लिंग पकड़ कर अपनी गुदा के छल्ले पर लगा कर धीरे धीरे नीचे होती है। लड़की अपना मुंह पैरों की ओर भी कर सकती है। इस आसन का सबसे बड़ा फायदा यह है कि सारी कमांड लड़की के हाथ में होती है। वो जब चाहे जितना चाहे अन्दर ले सकती है। कुछ महिलाओं को यह आसन बहुत पसंद आता है। यह आसन पुरुषों को भी अच्छा लगता है क्योंकि इस दौरान वे अपने लिंग को गुदा के अन्दर जाते देख सकते हैं। पर कुछ महिलायें शर्म के मारे इसे नहीं करना चाहती।

इसके अलावा और भी आसन हैं जैसे गोद में बैठ कर या सोफे या पलंग पर पैर नीचे लटका कर लड़की को अपनी गोद में बैठा कर गुदा-मैथुन किया जा सकता है। पसंद और सहूलियत के हिसाब से किसी भी आसन का प्रयोग किया जा सकता है।

“ओह… तो हम कौन सा आसन करेंगे ?”

“मैं तुम्हें सभी आसनों की ट्रेनिंग दूँगी पर फिलहाल तो करवट वाला ही ठीक रहेगा ”

“ठीक है।” मैंने कहा।

मुझे अब ध्यान आया मेरा प्यारे लाल तो सुस्त पड़ रहा है। ओह … बड़ी मुश्किल थी। आंटी के भाषण के चक्कर में तो सारी गड़बड़ ही हो गई। आंटी धीमे धीमे मुस्कुरा रही थी। उसने कहा,” मैं जानती हूँ सभी के साथ ऐसा ही होता है। पर तुम चिंता क्यों करते हो ? मेरे पास इसका ईलाज है।”

अब वो थोड़ी सी उठी और मेरे अलसाए से लंड को हाथ में पकड़ लिया वो बोलीं,”इसे ठीक से साफ़ किया है ना ?”

“जी हाँ”

अब उसने मेरा लंड गप्प से अपने मुंह में भर लिया और चूसने लगी। मुंह की गर्मी और लज्जत से वो फिर से अकड़ने लगा। कोई 2-3 मिनट में ही वो तो फिर से लोहे की रोड ही बन गया था।

उसने पास रखे तौलिए से उसे पोंछा और फिर पास रखे निरोध की ओर इशारा किया। मुझे हैरानी हो रही थी। आंटी ने बताया कि गुदा-मैथुन करते समय हमेशा निरोध (कंडोम) का प्रयोग करना चाहिए। इससे संक्रमण नहीं होता और एड्स जैसी बीमारियों से भी बचा जा सकता है।

अब मैंने अपने लंड पर निरोध चढ़ा लिया और उस पर नारियल का तेल लगा लिया। आंटी करवट के बल हो गई और अपना बायाँ घुटना मोड़ कर नीचे एक तकिया रख लिया। अब उसके मोटे मोटे गुदाज नितम्बों के बीच उसकी गांड और चूत दोनों मेरी आँखें के सामने थी। मैंने अपना सिर नीचे झुका कर एक गहरा चुम्बन पहले तो चूत पर लिया और फिर उसकी गांड के छेद पर। अब मैंने फिर से बोरोप्लस के क्रीम की ट्यूब में बाकी बची क्रीम उसकी गांड में डाल दी। आंटी ने अपने बाएं हाथ से अपने एक नितम्ब को पकड़ कर ऊपर की ओर कर लिया। अब तो गांड का छेद पूरा का पूरा दिखने लगा। उसके छल्ले का रंग सुर्ख लाल सा हो गया था। अब एक बार प्यारे लाल की मदद की जरुरत थी। मैंने उस पर भी नारियल का तेल लगाया और फिर से उसकी गांड में डाल कर 5-6 बार अन्दर बाहर किया। इस बार तो आंटी को जरा भी दर्द नहीं हुआ। वो तो बस अपने उरोजों को मसल रही थी। मैं उसकी दाईं जाँघ पर बैठ गया और अपने लंड के आगे थोड़ी सी क्रीम लगा कर उसे आंटी की गांड के छेद पर टिका दिया।

मेरा दिल उत्तेजना और रोमांच के मारे धड़क रहा था। लंड महाराज तो झटके ही खाने लगे थे। उसे तो जैसे सब्र ही नहीं हो रहा था। मैंने अपने लंड को उसके छेद पर 4-5 बार घिसा और रगड़ा, फिर उसकी कमर पकड़ी और अपने लंड पर दबाव बनाया। आंटी थोड़ा सा आगे होने की कोशिश करने लगी पर मैं उसकी जाँघ पर बैठा था इसलिए वो आगे नहीं सरक सकती थी। मैंने दबाव बनाया तो मेरा लंड थोड़ा सा धनुष की तरह मुड़ने लगा। मुझे लगा यह अन्दर नहीं जा पायेगा जरूर फिसल जाएगा। इतने में मुझे लगा आंटी ने बाहर की ओर जोर लगाया है। फिर तो जैसे कमाल ही हो गया। पूरा सुपाड़ा अन्दर हो गया। मैं रुक गया। आंटी का शरीर थोड़ा सा अकड़ गया। शायद उसे दर्द महसूस हो रहा था। मैंने उसके नितम्ब सहलाने शुरू कर दिए। प्यार से उन्हें थपथपाने लगा। गांड का छल्ला तो इतना बड़ा हो गया था जैसे किसी छोटी बच्ची की कलाई में पहनी हुई कोई लाल रंग की चूड़ी हो। उसकी चूत भी काम रस से गीली थी। मैंने अपने बाएं हाथ की अँगुलियों से उसकी फांकों को सहलाना शुरू कर दिया।

2-3 मिनट ऐसे ही रहने के बाद मैंने थोड़ा सा दबाव और बनाया तो लंड धीरे धीरे आगे सरकाना शुरू हो गया। अब तो किला फ़तेह हो ही चुका था और अब तो बस आनंद ही आनंद था। मैंने अपना लंड थोड़ा सा बाहर निकाला और फिर अन्दर सरका दिया। आंटी तो बस कसमसाती सी रह गई। मेरे लिए तो यह किसी स्वर्ग के आनंद से कम नहीं था। एक नितांत कोरी और कसी हुई गांड में मेरा लंड पूरा का पूरा अन्दर घुसा हुआ था। मैंने एक थपकी उसके नितम्बों पर लगाईं तो आंटी की एक मीठी सीत्कार निकल गई।

“चंदू अब धीरे धीरे अन्दर बाहर करो !” आंटी ने आँखें बंद किये हुए ही कहा। अब तक लंड अच्छी तरह गांड के अन्दर समायोजित हो चुका था। बे रोक टोक अन्दर बाहर होने लगा था। छल्ले का कसाव तो ऐसा था जैसे किसी ने मेरा लंड पतली सी नली में फंसा दिया हो।

“चांदनी तुम्हें दर्द तो नहीं हो रहा ?”

“अरे बावले, तुम्हारे प्रेम के आगे ये दर्द भला क्या मायने रखता है। मेरी ओर से ये तो नज़राना ही तुम्हें। तुम बताओ तुम्हें कैसा लग रहा है ?”

“मैं तो इस समय स्वर्ग में ही हूँ जैसे। तुमने मुझे अनमोल भेंट दी है। बहुत मज़ा आ रहा है।” और मैंने जोर से एक धक्का लगा दिया।

“ऊईई … माआअ … थोड़ा धीरे …”

“चांदनी मैंने कहानियों में पढ़ा है कि कई औरतें गांड मरवाते समय कहती हैं कि और तेजी से करो … फाड़ दो मेरी गांड… आह… बड़ा मज़ा आ रहा है ?”

“सब बकवास है… आम और पर औरतें कभी भी कठोरता और अभद्रता पसंद नहीं करती। वो तो यही चाहती हैं कि उनका प्रेमी उन्हें कोमलता और सभ्य ढंग से स्पर्श करे और शारीरिक सम्बन्ध बनाए। यह तो उन मूर्ख लेखकों की निरी कल्पना मात्र होती है जिन्होंने ना तो कभी गांड मारी होती है और ना ही मरवाई होती है। असल में ऐसा कुछ नहीं होता। जब सुपाड़ा अन्दर जाता है तो ऐसे लगता है जैसे सैंकड़ों चींटियों ने एक साथ काट लिया हो। उसके बाद तो बस छल्ले का कसाव और थोड़ा सा मीठा दर्द ही अनुभव होता है। अपने प्रेमी की संतुष्टि के आगे कई बार प्रेमिका बस आँखें बंद किये अपने दर्द को कम करने के लिए मीठी सीत्कार करने लगती है। उसे इस बात का गर्व होता है कि वो अपने प्रेमी को स्वर्ग का आनंद दे रही है और उसे उपकृत कर रही है !”

आंटी की इस साफगोई पर मैं तो फ़िदा ही हो गया। मैं तो उसे चूम ही लेना चाहता था पर इस आसन में चूमा चाटी तो संभव नहीं थी। मैंने उसकी चूत की फांकों और दाने को जोर जोर से मसलना चालू कर दिया। आंटी की चूत और गांड दोनों संकोचन करने लगी थी। मुझे लगा कि उसने मेरा लंड अन्दर से भींच लिया है। आह… इस आनंद को शब्दों में तो बयान किया ही नहीं जा सकता।

लंड अन्दर डाले मुझे कोई 10-12 मिनट तो जरूर हो गए थे। आमतौर पर इतनी देर में स्खलन हो जाता है पर मैंने आज दिन में मुट्ठ मार ली थी इसलिए मैं अभी नहीं झड़ा था। लंड अब आराम से अन्दर बाहर होने लगा था।

आंटी भी आराम से थी। वो बोली,” मैं अपना पैर सीधा कर रही हूँ तुम मेरे ऊपर हो जाना पर ध्यान रखना कि तुम्हारा प्यारे लाल बाहर नहीं निकले। एक बार अगर यह बाहर निकल गया तो दुबारा अन्दर डालने में दिक्कत आएगी और हो सकता है दूसरे प्रयाश में अन्दर डालने से पहले ही झड़ जाओ ?”

“ओके।..”

अब आंटी ने अपना पैर नीचे कर लिया और अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। तकिया उसके पेट के नीचे आ गया था। मैं ठीक उसके ऊपर आ गया और मैंने अपने हाथ नीचे करके उसके उरोज पकड़ लिए। उसने अपनी मुंडी मोड़ कर मेरी ओर घुमा दी तो मैंने उसे कस कर चूम लिया। मैंने अपनी जांघें उसके चौड़े नितम्बों के दोनों ओर कस लीं। जैसे ही आंटी अपने नितम्बों को थोड़ा सा ऊपर उठाया तो मैं एक धक्का लगा दिया।

आंटी की मीठी सीत्कार सुनकर मुझे लग रहा था कि अब उसे मज़ा भले नहीं आ रहा हो पर दर्द तो बिलकुल नहीं हो रहा होगा। मुझे लगा जैसे मेरा लंड और भी जोर से आंटी की गांड ने कस लिया है। मैं तो चाहता था कि इसी तरह मैं अपना लंड सारी रात उसकी गांड में डाले बस उसके गुदाज बदन पर लेटा ही रहूँ। पर आखिर शरीर की भी कुछ सीमाएं होती हैं। मुझे लग रहा था कि मेरा लंड थोड़ा सा फूलने और पिचकने लगा है और किसी भी समय पिचकारी निकल सकती है। आंटी ने अपने नितम्ब ऊपर उठा दिए। मैंने एक हाथ से उसकी चूत को टटोला और अपने बाएं हाथ की अंगुली चूत में उतार दी। आंटी की तो रोमांच और उत्तेजना में चींख ही निकल गई। और उसके साथ ही मेरी भी पिचकारी निकलने लगी।

“आह।.. य़ाआआ……” हम दोनों के मुंह से एक साथ निकला। दो जिस्म एकाकार हो गए। इस आनंद के आगे दूसरा कोई भी सुख या मज़ा तो कल्पनातीत ही हो सकता है। पता नहीं कितनी देर हम इसी तरह लिपटे पड़े रहे।

मेरा प्यारे लाल पास होकर बाहर निकल आया था। हम दोनों ही उठ खड़े हुए और मैंने आंटी को गोद में उठा लिया और बाथरूम में सफाई कर के वापस आ गए। मैंने आंटी को बाहों में भर कर चूम लिया और उसका धन्यवाद किया। उसके चहरे की रंगत और ख़ुशी तो जैसे बता रही थी कि मुझे अपना सर्वस्व सोंप कर मुझे पूर्ण रूप से संतुष्ट कर कितना गर्वित महसूस कर रही है। मुझे पक्का प्रेम गुरु बनाने का संतोष उसकी आँखों में साफ़ झलक रहा था।

उस रात हमने एक बार फिर प्यार से चुदाई का आनंद लिया और सोते सोते एक बार गधापचीसी का फिर से मज़ा लिया। और यह सिलसिला तो फिर अगले 8-10 दिनों तक चला। रात को पढ़ाई करने के बाद हम दोनों साथ साथ सोते कभी मैं आंटी के ऊपर और कभी आंटी मेरे ऊपर ………

मेरी प्यारी पाठिकाओं ! आप जरूर सोच रही होंगी वाह।.. प्रेम चन्द्र माथुर प्रेम गुरु बन कर तुम्हारे तो फिर मज़े ही मज़े रहे होंगे ?

नहीं मेरी प्यारी पाठिकाओं ! जिस दिन मेरी परीक्षा ख़त्म हुई उसी दिन मुझे आंटी ने बताया कि वो वापस पटियाला जा रही है। उसने जानबूझ कर मुझे पहले नहीं बताया था ताकि मेरी पढ़ाई में किसी तरह का खलल (विघ्न) ना पड़े। मेरे तो जैसे पैरों के नीचे से जमीन ही निकल गई। मैंने तो सोच था कि अब छुट्टियों में आंटी से पूरे 84 आसन सीखूंगा पर मेरे सपनों का महल तो जैसे किसी ने पूरा होने से पहले तोड़ दिया था।

जिस दिन वो जाने वाली थी मैंने उन्हें बहुत रोका। मैं तो अपनी पढ़ाई ख़त्म होने के उपरान्त उससे शादी भी करने को तैयार था। पर आंटी ने मना कर दिया था पता नहीं क्यों। उन्होंने मुझे बाहों में भर कर पता नहीं कितनी देर चूमा था। और कांपती आवाज में कहा था,”प्रेम, मेरे जाने के बाद मेरी याद में रोना नहीं… अच्छे बच्चे रोते नहीं हैं। मैं तो बस बुझती शमा हूँ। तुम्हारे सामने तो पूरा जीवन पड़ा है। तुम अपनी पढ़ाई अच्छी तरह करना। जिस दिन तुम पढ़ लिख कर किसी काबिल बन जाओगे हो सकता है मैं देखने के लिए ना रहूँ पर मेरे मन को तो इस बात का सकून रहेगा ही कि मेरा एक शिष्य अपने जीवन के हर क्षेत्र में कामयाब है !”

मैंने छलकती आँखों से उन्हें विदा कर दिया। मैंने बाद में उन्हें ढूंढ़ने की बहुत कोशिश की पर उनसे फिर कभी मुलाकात नहीं हो सकी। आज उनकी उम्र जरूर 45-46 की हो गई होगी पर मैं तो आज भी अपना सब कुछ छोड़ कर उनकी बाहों में समा जाने को तैयार हूँ। आंटी तुम कहाँ हो अपने इस चंदू के पास आ जाओ ना। मैं दिल तो आज 14 वर्षों के बाद भी तुम्हारे नाम से ही धड़कता है और उन हसीं लम्हों के जादुई स्पर्श और रोमांच को याद करके पहरों आँखें बंद किये मैं गुनगुनाता रहता हूँ :

तुम मुझे भूल भी जाओ तो ये हक है तुमको

मेरी बात ओर है, मैंने तो मोहब्बत की है।

मेरे प्यारे पाठको और पाठिकाओं आंटी के बनाए इस प्रेम गुरु को क्या आप एक मेल भी नहीं करोगे ?

आपका प्रेम गुरु

eXTReMe Tracker